उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि सजायाफ्ता कैदियों को भी सम्मान से जीने का अधिकार है

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि सजायाफ्ता कैदियों को भी सम्मान से जीने का अधिकार है और उन्हें सभी कानूनी माध्यमों को का इस्‍तेमाल करने का समय दिये बिना मनमाने ढंग से, जल्दबाजी और गुप्त तरीके से फांसी नहीं दी जा सकती। न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी और यू.यू. ललित की पीठ ने वर्ष 2008 में उत्तर प्रदेश में एक महिला और उसके प्रेमी द्वारा अपने परिवार के सात लोगों की हत्या किये जाने के लिए सुनाई गई फांसी की सजा रद्द करते हुए यह बात कही। न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार मौत की सजा की पुष्टि के बाद ही खत्म नहीं हो जाता। न्यायालय ने कहा कि जो अपराधी कानूनी सहायता लेने की स्थिति में नहीं है उसे कानूनी सहायता मुहैया कराई जानी चाहिए।