उत्तराखंड में प्रकृति का प्रकोप, हजारों में हो सकता है मरने वालों का आंकड़ा

tatpar 20 june 2013

रुद्रप्रयाग / पिथौरागढ़ / केदार घाटी: उत्तराखंड में आए भीषण सैलाब को इस क्षेत्र के 100 साल के इतिहास में सबसे बड़ी कुदरती आपदा माना जा रहा है। 16 जून की रात से उत्तराखंड में शुरू हुई तबाही की खौफनाक तस्वीरें लगातार सामने आ रही हैं। प्रकृति के प्रकोप ने इस राज्य के एक बड़े हिस्से को नेस्तनाबूद कर दिया है।

आधिकारिक तौर पर 150 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई है, लेकिन स्थानीय सूत्रों के मुताबिक मरने वालों का आंकड़ा हजारों में हो सकता है। करीब नौ हजार लोगों को प्रभावित इलाकों से बाहर निकाला गया है, लेकिन अब भी करीब 60 हजार लोग फंसे हुए बताए गए हैं। राहत और बचाव के काम के लिए सेना, आईटीबीपी, बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन और नेशनल डिजास्टर रिस्पांस टीम की कंपनियां तैनात की गई हैं।

केदारनाथ में फंसे लोगों को वहां से निकालने के लिए भारतीय वायुसेना के आठ अतिरिक्त हेलीकॉप्टर लगाए गए हैं। पुलिस महानिरीक्षक आरएस मीणा ने बताया कि हेमकुंड साहिब के रास्ते में केदारनाथ और गोविंदघाट में फंसे 15,000 लोगों को निकालकर वायु एवं सड़क मार्ग से जोशीमठ स्थित राहत शिविर लाया गया है। प्रशासन बारिश और बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में फंसे लोगों को बाहर निकालने पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।

मीणा ने कहा, प्रभावित इलाकों में बचाव एवं राहत अभियान में पहले से लगाए गए 12 हेलीकॉप्टरों के अलावा अभियान को तेज करने के लिए आठ और हेलीकॉप्टरों को लगाया गया है। उन्होंने कहा कि अभी राहत अभियान बारिश से सबसे अधिक प्रभावित रुद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ मंदिर और इसके आसपास के इलाकों में केंद्रित है, जहां 90 धर्मशालाएं बह गई हैं, जिसमें ढेर सारे तीर्थयात्री ठहरे हुए थे।

प्रधानमंत्री ने अंतरिम राहत के तौर पर उत्तराखंड को एक हजार करोड़ रुपये देने का ऐलान किया है। राज्य सरकार के मुताबिक 500 सड़कें और कम से से कम 175 पुल बाढ़ के पानी में बह गए हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अथॉरिटी ने कहा है कि राज्य में सुनामी जैसे हालात हैं और पुनर्वास तथा और पुनर्निर्माण में कई महीने तक लग सकते हैं। जो तस्वीरें सामने आईं हैं, उसमें पिथौरागढ़ में कटाव और जमीन खिसकने के चलते बड़ी संख्या में घर तबाह होते दिखाई दे रहे हैं।

मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के मुताबिक रुद्रप्रयाग सबसे बुरी तरह प्रभावित है। अल्मोड़ा में भी जमीन खिसकने के चलते नेशनल हाइवे-87 पूरी बंद पड़ा है। भूस्खलन के बाद रास्ता पूरी तरह से बंद हो गया है, जिसे जेसीबी मशीन की मदद से साफ करने की कोशिश की जा रही है।

केदारनाथ धाम में लाशों का अंबार लगा हुआ है। यहां राहत अभियान धीमा चल रहा है, क्योंकि दो में से एक हेलीपैड खत्म हो चुका है। केदार घाटी में एक जगह तो पूरी की पूरी सड़क नक्शे से गायब हो गई है। यह वही जगह है, जहां से केदारनाथ के लिए आगे जाते हैं। बड़े रास्ते के टूट जाने के बाद गाड़ियां छोटे रास्तों का इस्तेमाल कर रही हैं। इन पर भी भारी ट्रैफिक और जाम है।

सड़क टूटने से राहत और बचाव के काम में काफी दिक्कतें आ रही हैं। हालांकि राहत पहुंचाने के लिए सेना ने एक वैकल्पिक रास्ता तैयार किया है। बचाव और राहत अभियान को तेज करते हुए उत्तराखंड में बाढ़ से प्रभावित इलाकों में फंसे लोगों को निकालने में 22 हेलीकॉप्टर लगाए गए हैं। इनमें से अधिकतर हेलीकॉप्टर ‘ALH ध्रुव’ और दूसरे हल्के वजन वाले हेलीकॉप्टर हैं।

गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह ने बुधवार को बताया कि मौसम में सुधार के बाद लोगों को निकालने के काम में तेजी आई है और सरकार बाढ़ प्रभावित इलाकों में खाने का सामान पहुंचा रही है। उन्होंने कहा कि पहली प्राथमिकता उन लोगों को बाहर निकालने की है. जो गंभीर संकट में फंसे हैं। इस बीच. पंजाब सरकार ने श्री हेमकुंड साहिब और उसके आसपास फंसे श्रद्धालुओं को निकालने के लिए एक निजी हेलीकॉप्टर किराये पर लिया है, जो वहां फंसे श्रद्धालुओं को एयर लिफ्ट कर सुरक्षित स्थान पर ले जाएगा।

उत्तरकाशी से गंगोत्री तक के पूरे इलाके में सबसे ज्यादा मार पड़ी है। यहां बड़े पैमाने पर पहाड़ गिरे हैं। अलकनंदा घाटी का बेहद बुरा हाल है। केदारनाथ मंदिर के पास गौरीकुंड से लेकर मंदाकिनी नदी के किनारे−किनारे रुद्रप्रयाग तक का इलाका तबाह हो गया है। इनमें से बहुत सारे इलाके काफी दूर हैं और वहां तक पहुंचना मुश्किल है। श्रीनगर में एसएसबी यानी सशस्त्र सीमा बल की नई इमारत पानी की लहरों में तबाह हो गई। आसपास के इलाकों में कई घर बर्बाद हो गए। बहुत सारे परिवारों का सब लुट गया है और वे अब सड़क पर हैं।

यही हाल श्रीनगर के लगभग आधे मकानों का भी है। अलकनंदा इतनी तेज़ी से ऊपर चढ़ी कि लोग तो ऊपर भाग निकले. लेकिन उनका सामान छूट गया।  केदारनाथ और हेमकुंड में फंसे लोगों को बाहर निकालने के लिए सेना ने जवानों की खास टीमें भेजी हैं। इन 18 टीमों में पांच−पांच पैरा ट्रूपर्स शामिल हैं। ख़ास ऑपरेशन के लिए ट्रेंड ये जवान बिना किसी मदद के करीब एक हफ्ता किसी भी माहौल में गुजार सकते हैं। इन जवानो के पास खाना दवाई और संचार के उपकरण है। सेना के डॉक्टरों की टीम भी लोगों को राहत पहुंचाने के लिए वहां मौजूद है।

उत्तराखंड में आई बाढ़ से हुई तबाही के बाद सरकार ने कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाने वाले दो से 10वें बैच तक की यात्रा रोक दी है। विदेश मंत्रालय ने एक वक्तव्य जारी कर यह जानकारी दी है। कैलाश मानसरोवर जाने के लिए के लिए श्रद्धालुओं को उत्तराखंड के जिन रास्तों से होकर जाना पड़ता है, वे भी क्षतिग्रस्त हो गए हैं। स्थानीय प्रशासन के मुताबिक रास्ते को ठीक होने में कम से कम एक महीने का वक्त लगेगा, इसलिए 10वें बैच तक की यात्रा रद्द कर दी गई है। इस यात्रा में 9 जून से 9 सितंबर तक 18 बैच जाने थे। अमरनाथ तक पहुंचने के लिए भारतीय सीमा में 647 किलोमीटर और चीन के अधिकार वाले 243 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *