एकात्म_मानववाद

 

 

 

 

 

 

मेरी किशोरावस्था मे एक बड़ा सुंदर संयोग हुआ, एक ओर शाखा जाना होता था और दूजी ओर रूस का कम्युनिस्ट साहित्य पढ़ा करता था मैं। दो विरोधी ध्रुवों पर एक साथ प्रवास होता था मेरा। तब के रूस के भारत हितैषी राष्ट्रपति ब्रेझनेव से बहुत प्रभावित रहता था। रूस भारत का मित्र राष्ट्र कहलाता था सो मेरे किशोर मन में भी रूस की मित्र और अमेरिका की शत्रु की छवि थी। पढ़ने का मैं शौकीन था और रूसी साहित्य बड़े ही कम मूल्य पर मिल जाता था; सो, चेखोव, मैक्सिम गोर्की, पुश्किन, टॉलस्टाय, दोस्तोव्यसकी, लेनिन आदि को पढ़ लिया था मैंने। चेखोव तो आज भी मेरे प्रिय लेखक हैं। इसी क्रम में मैंने #कार्लमार्क्स की #दासकेपिटल भी पढ़ ली थी। #खयालआया कि ये वही मार्क्स थे जिन्होंने अपने मृत्यु समय मे कहा था कि अच्छा हुआ #मैंमार्क्सिस्टनहुआ !! तो सारांश में यह कि #राष्ट्रीयस्वयंसेवकसंघ की #शाखा और #कम्युनिस्टसाहित्य दोनों के प्रभाव से बढ़ रहा था मेरा मानस। आज मुझे लगता है कि यदि #मार्क्सवाद के सिद्धांत में समानता थी तो वह केवल भारतीयता की ही देन थी किंतु #मार्क्स ने उसमें से भारतीयता का वैदिक तत्व निकालकर उसे प्रस्तुत किया, फलस्वरूप यह काल के गाल में चला गया। #पंडितदीनदयाल_उपाध्याय ने समानता में मानवता के तत्व को घोला व नागरिकता में राष्ट्रपुत्र के तत्व को मिलाया तो #एकात्ममानववाद का सिद्धांत बना। आज कोई भी निस्पृह, तटस्थ व निरापद होकर एकात्म मानववाद को पढ़े तो उसे इस सिद्धांत में देवत्व के साथ मानवत्व दिखाई देगा। साम्यवादी पढ़े, समाजवादी पढ़े, अमेरिकी पढ़े, रूसी पढ़ें, चीनी पढ़ें, दक्षिण पंथी पढ़े या वामपंथी पढ़े “एकात्म मानववाद” का सिद्धान्त उसे अपने सिद्धांतों का मर्म प्रतीत होगा यही इसकी एकमेव विशेषता है।

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