” एपल हो या गूगल-अल्फाबेट सबसे मूल्यवान तब होंगे जब हमारे लिए एकदम नया करेंगे ”

कल्पेश याग्निक का कॉलम
‘नया क्या और कहां से लाएं? हर बात तो कही जा चुकी है। आखिर मानव जाति को देखते हुए, रहते हुए, सोचते हुए सात हजार वर्ष जो हो चुके हैं!’ – फ्रेंंच कहावत
‘जब कोई काम समय से आगे दिखे तो जान लीजिए कि वास्तव में तो समय उस काम के पीछे रह गया है।’ – अमेरिकी कहावत
जिनकी ताकत पर मैं पत्रकारिता करता जा रहा हूं – उन पत्रकारों-संपादकों की एक बैठक में गंभीर मंथन के दौरान मैंने किसी ख़बर पर कहा -आप ने इसके कई पहलू क्यों नहीं तलाशे? जबकि ‘मैंने एेसी तमाम खोजबीन के लिए दो व्यक्ति विशेष रूप से नियुक्त कर रखे हैं?’ उन्होंने कहा, पता ही नहीं था कि ये दो कौन हैं, कहां बैठते हैं? मैंने कहा -उनका नाम लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन है! कैलिफोर्निया में बैठते हैं। दिन-रात, बारह महीने, बत्तीसों घड़ी काम करते हैं। जो कुछ भी आपको चाहिए, सिर्फ कुछ शब्द टाइप कर दीजिए।
भारी ठहाकों के बीच मैं बोलता गया।
बात जितनी मनोरंजक लग रही है, मैं उतना ही गंभीर हूं।
गूगल।
एक ऐसी यूनिवर्सिटी -जहां हरेक स्ट्रीम, हर ब्रांच, हर तरह की फैकल्टी सभी के लिए उपलब्ध है। गूगल, एक ऐसा स्कूल -जहां हर बच्चे को, हर तरह का प्रश्न पूछने और उत्तर पाने का अधिकार है। बस, आपको वो शब्द लिखने का तरीका आ जाए -तो जो खोज बाकी लोग दो दिन में करेंगे -वो आप दस मिनट में।
गूगल इज़ गॉड। अमेरिका में ऐसा पिछले 12-13 साल से कहा जा रहा है।
किन्तु हमारे यहां भक्त, भगवान से बड़ा होता है। इसीलिए हम अधिक संवेदनशील हैं। हमारी भावनाएं प्रबल हैं। इसीलिए जिज्ञासाएं भी हैं।
गूगल के खतरे बहुत ही बड़े हैं।
इसका हमारे मस्तिष्क पर भयंकर असर पड़ा है।
अब हम कुछ भी ध्यान से पढ़कर याद कहां रखते हैं? गूगल कर लेंगे बाद में।
350 करोड़ सर्च प्रतिदिन का औसत इसीलिए है गूगल पर। गूगल की सात प्रॉपर्टी ऐसी हैं जिनके पास 100 करोड़ से अधिक यूजर्स हैं : एप्स, सर्च, एंड्रॉयड, क्रोम, मैप, यूट्यूब और दो दिन पहले इस श्रेणी में आया जीमेल।
पता नहीं, हम सभी को यह सच पता है या नहीं -कि गूगल पर, उसके अनगिनत एप्स पर हम जो कुछ भी देखते, पढ़ते या लिखते हैं -वह कभी भी मिट नहीं सकता। हम सोच रहे हैं कि हम डिलीट कर चुके हैं। होता नहीं है।
जैसा कि ब्रह्माण्ड की थ्योरी हमें बचपन में बताई गई थी। कि जो कुछ भी हम बोलते हैं -वो हमेशा रहता है। इसीलिए हमेशा अच्छे वाक्य, अच्छी भाषा बोलिए -यही सिखाया गया।
यह तो हमारी अपनी ग़लती है। गूगल तो हमारी सहायता कर रहा है।
किन्तु गूगल से हमें खतरा कहीं बड़ा है।
हमारी सारी निजी जिंदगी, गोपनीयता भंग कर दी है गूगल ने।
यहां गूगल अर्थ से खतरों की नहीं, प्राइवेसी पर हमले की बात चल रही है। हमारी हर जानकारी का ‘बंडल’ बनाकर गूगल विज्ञापन कंपनियों को पहुंचाता है।
हालांकि ऐसा करने से पहले पूछता भी है। किन्तु उससे खतरे कम नहीं हो जाते।

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