ऐसे शुरु हुई मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा

Tatpar 14 Jan 2014

राकेश झा
मकर संक्रांति के दिन गुजरात सहित देश के कुछ भागों में पतंग उड़ाने की परंपरा है। संभवतः इस परंपरा की शुरूआत भगवान श्री राम के समय में हुई थी। तुलसी दास जी ने राम चरित मानस में भगवान श्री राम के बाल्यकाल का वर्णन करते हुए कहा गया है कि भगवान श्री राम ने भी पतंग उड़ायी थी।
राम इक दिन चंग उड़ाई।
इंद्रलोक में पहुंची जाई।।
तमिल की तन्दनानरामायण में भी इस घटना का जिक्र किया गया है। इस रामायण के अनुसार मकर संक्रांति ही वह पावन दिन था जब भगवान श्री राम और हनुमान जी की मित्रता हुई। मकर संक्राति के दिन राम ने जब पतंग उड़ायी तो पतंग इन्द्रलोक में पहुंच गयी।

पंतंग को देखकर इन्द्र के पुत्र जयंती की पत्नी सोचने लगी कि, जिसकी पतंग इतनी सुन्दर है वह स्वयं कितना सुंदर होगा। भगवान राम को देखने की इच्छा के कारण जयंती की पत्नी ने पतंग की डोर तोड़कर पतंग अपने पास रख ली।

भगवान राम ने हनुमान जी से पतंग ढूंढकर लाने के लिए कहा। हनुमान जी इंद्रलोक पहुंच गये। जयंत की पत्नी ने कहा कि जब तक वह राम को देखेगी नहीं पतंग वपस नहीं देगी। हनुमान जी संदेश लेकर राम के पास पहुंच गये। भगवान राम ने कहा कि वनवास के दौरान जयंत की पत्नी को वह दर्शन देंगे। हनुमान जी राम का संदेश लेकर जयंत की पत्नी के पास पहुंचे। राम का आश्वासन पाकर जयंत की पत्नी ने पतंग वापस कर दी।

तिन सब सुनत तुरंत ही, दीन्ही दोड़ पतंग।
खेंच लइ प्रभु बेग ही, खेलत बालक संग।।