कल्पेश याग्निक का कॉलम: देश इसे कभी माफ नहीं कर सकेगा

तड़के चार बजना चाहते हैं। इंसाफ के गलियारे गूंज रहे हैं। पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। न्यायपालिका का सम्मान सर्वोच्च है। किंतु किसके लिए है इतनी चिंता, इतनी मशक्कत, इतनी बेचैनी? एक आतंकी के लिए, जिसने अपने परिवार से रेकी करवाई थी कि बम वहां फटे, जहां स्कूल के बच्चों की बस गुजरती हो। सेंचुरी बाजार की अकेली साजिश को ही लें तो सुनते ही कांप जाएंगे कि वहां कई दिनों तक याकूब के आतंकियों ने यह पड़ताल की थी कि आरडीएक्स कहां भरें। ताकि ज्यादा से ज्यादा निर्दोष लोगों के टुकड़े-टुकड़े हो जाएं। मैनहोल में भरे थे विस्फोटक। अकेले वहीं कुल 113 बच्चे, महिलाएं और बीमार मारे गए थे। मैनहोल के ऊपर से बस के गुजरते ही फटे थे बम। उन चीखों-चीत्कारों को अनसुना कर, हम रात-रातभर कौन सी दया दिखा रहे हैं? 22 साल में हमें कुछ नहीं बताया गया। अब अचानक प्रक्रिया की खामियां गिनाई जा रही हंै। कोई भी कानून अंतत: न्याय के लिए बना है। न्याय पर पहला अधिकार पीड़ित का है। आतंकी के आंसू इस तरह इंसाफ के तराजू को कैसे दबा सकते हैं? ये तब जबकि सुप्रीम कोर्ट की ही विस्तारित बेंच याकूब मेमन की फांसी पर रोक लगाने से तब इनकार कर चुकी थी जब- उनके दो वरिष्ठ जजों में से एक ने न्याय की प्रक्रिया पर प्रश्न उठाया था। राष्ट्रपति से खारिज दया याचिका फिर राष्ट्रपति, फिर राज्यपाल; पता नहीं कहां-कहां भेजी गई। काश, पीड़ितों के लिए कोई ऐसा कर पाता।