भारत के पास होगा अपना GPS, मिलेगा इकोनॉमी को फायदा

नई दिल्ली। भारत ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम में एक नया अध्याय रचने की दहलीज पर है। शनिवार को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने इंडियन रीजनल नैवीगेशन सेटेलाइट सिस्‍टम (आईआरएनएसएस) के तहत चौथे सेटेलाइट का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण कर दिया है। इस सफल कदम से भारत ने अपना खुद का जीपीएस सिस्टम विकसित करने की राह में एक कदम औऱ बढ़ा दिया है। इसरो की साल 2016 तक पूरी तरह से खुद का जीपीएस सिस्टम विकसित करने की योजना है।
अगर ऐसा होता है, तो भारत की अमेरिका सहित दूसरे देशों पर निर्भरता कम हो जाएगी। जिसका सबसे बड़ा फायदा भारतीय इकोनॉमी को मिलने वाला है। अभी देश में जीपीएस सेवाओं के लिए गूगल जैसी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता है। गूगल की एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में जीपीएस आधारित सेवाओं का बाजार साल 2015 में करीब 150 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है।
भारत को मिलेगा नया बाजार
देश में अपना खुद का जीपीएस सिस्टम विकसित हो जाने के बाद, भारत प्रक्षेपण यान की तरह जीपीएस की सेवाएं दूसरे देशों को दे सकेगा। अभी भारत का सस्ता प्रक्षेपण यान होने की वजह से कई देश भारत से सेटेलाइट प्रक्षेपण सर्विस ले रहे हैं।
भारत का होगा अहम स्थान
इसरो के चेयरमैन एएस किरन कुमार ने कहा कि एक बार यह चारों सैटेलाइट अंतरिक्ष में स्‍थापित हो जाने पर पृथ्वी पर रिसीवर की मदद से कोई भी व्‍यक्तिगत रूप से भारतीय क्षेत्र में अपनी लोकेशन का पता लगा सकेगा। उन्‍होंने कहा कि इससे हमें अपना ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्‍टम (जीपीएस) हासिल होगा। इस सैटेलाइट को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्‍पेस सेंटर से लांचिंग वाहन पीएसएलवीसी-27 की मदद से अंतरिक्ष में भेजा गया है।
क्‍यों पड़ी जरूरत
इस तरह के नैवीगेशन सिस्‍टम की जरूरत इसलिए पड़ी है क्‍योंकि मुश्किल समय में विदेशी सरकार के नियंत्रण वाले ग्‍लोबल पोजीशनिंग सिस्‍टम से प्राप्‍त जानकारी पर ज्‍यादा भरोसा नहीं किया जा सकता है। उदहारण के तौर पर कारगिल युद्ध के समय भारतीय सेना अमेरिकन जीपीएस पर निर्भर थी। इसके बाद ही भारत सरकार ने अपना स्‍वयं का नैविगेशन सिस्‍टम विकसित करने का निर्णय लिया। आईआरएनएसएस के तहत कुल 7 सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजे जाने हैं, जिसमें से चार सैटेलाइट अभी तक भेजे जा चुके हैं।
कैसे करेगा काम
आईआरएनएसएस दो तरह की सेवाएं मुहैया कराएगा। इसमें नागरिकों के उपयोग के लिए स्‍टैंडर्ड पोजीशनिंग सर्विस और सेना के उपयोग के लिए प्रतिबंधित सर्विस उपलब्‍ध कराई जाएगी। अभी तक देश में विदेशी सैटेलाइट के जरिये जीपीएस सेवा का उपयोग किया जा रहा है। जिसमें गूगल की भागीदारी सबसे बड़ी है।