दान में मिली आंखें अस्पताल ने कचरे में फेंकी, केंद्र के बनाए नियम भी ताक पर रखे

ग्वालियर. नेत्रदान महादान। एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में जितने दृष्टिहीन हैं उनमें से हर तीसरा भारतीय है। करोड़ों रुपए सरकारों ने सिर्फ इसलिए फूंक दिए ताकि नेत्रदान के लिए लोग जागरूक हों। ग्वालियर का जयारोग्य अस्पताल सबसे अलग है। क्योंकि अस्पताल को साल में छह जोड़ी नेत्र दान में मिल जाते हैं। लेकिन वो किसी दृष्टिहीन को रोशनी देने के बजाय कचरे में फेंक दिए जाते हैं।
दैनिक भास्कर के रिपोर्टर और फोटो जर्नलिस्ट की स्पेशल टीम ने स्वर्गीय अमृत गंभीर के नेत्रदान के बाद 22 अप्रैल 2015 से इस पूरे मामले की पड़ताल शुरू की कि आखिर दान में मिली आंखों का हो क्या रहा है? और इसके सबूत जुटाना शुरू किए।
लगभग दो माह की मेहनत के बाद सामने आया कि मरीजों के लिए भगवान का दर्जा रखने वाले डॉक्टरों के लिए आपका दान आठ ग्राम (आंख का अनुमानित वजन) कचरे से कम नहीं। अब स्थिति यह है कि अस्पताल में आंखों की रोशनी लौटने की चाह रखने वाले जरूरतमंदों के नाम-पते नोट करना भी बंद हो गए हैं।
केस-1
दोबारा करूंगा मां का श्राद्ध: मैंने अपनी मां की आंखें जेएएच में इसलिए दान कराई थीं कि दो लोगों की अंधेरी दुनिया रोशन हो। उम्मीद थी कि जेएएच प्रबंधन इनका प्रत्यारोपण करेगा। लेकिन आपके द्वारा जब मुझे यह बताया गया कि मेरी मां की आंखों को कचरे की तरह फेंक दिया गया। मुझे इससे आघात पहुंचा है। मृत शरीर के अंगों से इस तरह का खिलवाड़ तो कोई पशु ही कर सकता है। लेकिन मुझे अब नए सिरे से अपनी मां का श्राद्व करना पड़ेगा। किशन गंभीर, स्व. अमृत गंभीर के पुत्र
केस-2
रोशनी के इंतजार में दुनिया छोड़ गई मेरी मां: मेरी मां भगवती देवी की दोनों आंखों की रोशनी चली गई थी। उन्होंने आधी जिंदगी बिना आंखों के बिता दी। वर्ष 2008 में मैंने जेएएच की आई बैंक में रजिस्ट्रेशन कराया था और उम्मीद जताई थी कि मेरी मां को आंखें मिल जाएंगी। जेएएच से कोई फोन नहीं आया और फरवरी, 2015 में मेरी मां का निधन हो गया।रामस्वरूप यादव, स्व. भगवतीदेवी के पुत्र