देश का सबसे बड़ा घोटाला, सबसे रहस्यमय मौतें और राहत में शिवराज

‘तुम्हारे व्यापक भ्रष्टाचार को बर्दाश्त करने के बजाय मैं पार्टी को ही शानदार ढंग से दफन करने को प्राथमिकता दूंगा।’– महात्मा गांधी, 1935 में गवर्मेंट ऑफ इंडिया एक्ट में बनी प्रांतीय सरकार के भ्रष्टाचार से व्यथित होकर
‘अब मैं राहत महसूस कर रहा हूं। एक बोझ-सा था, जो उतर गया।’ यही घोषणा की थी शिवराज सिंह ने। जब सुप्रीम कोर्ट ने व्यापमं घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपने की उनकी बात मान ली।
कैसे राहत महसूस कर सकते हैं वे? देश का सबसे दर्दनाक घोटाला उनके कार्यकाल में हुआ है। इितहास में इतना गहरा, इतना उलझा और इतना फैला हुआ कोई दूसरा घोटाला नहीं है।
कौन-सा बोझ उतर गया मुख्यमंत्री पर से? उनके स्वयं के स्टाफ का नाम आ रहा है। चारों ओर से लिया जा रहा है। उनके परिवार तक का नाम उछाला जा रहा है। उनकी सरकार पर भयावह दोष लग चुका है। घोटाले की जांच, घोटाले के हर चरित्र को उसे मिले लाभ के मुकाबले जो कुछ हानि पहुंचा सकती थी – पहुंचा चुकी है। तब जाकर सीबीआई जांच की अपील करने से बोझ कैसे उतर गया?
बोझ तो अब आएगा। जब मध्यप्रदेश के नौजवान, लाख टैलेंट के बावजूद, ‘फर्जी डॉक्टर’ के रूप में हेय दृष्टि से देखे जाएंगे। शुरू हो चुकी है यह नफ़रत। शिवराज सरकार के कुछ न करने के कारण।
फिर मौतें? कितनी अमानवीय लगती है सरकार जब वह हर मौत के बाद तत्काल उस मौत की व्याख्या करने में जुट जाती है। कि कितनी “सामान्य” है यह मौत। इस शव का व्यापमं घोटाले से संबंध नहीं है। एेसे। और तो और, स्वयं शिवराज ऐसा कर रहे हैं। तीन बार के शक्तिशाली मुख्यमंत्री। वे अब तो इस बात का श्रेय भी प्राप्त कर रहे हैं कि ‘मैंने ही यह घोटाला उजागर किया, न कि मीिडया ने या कांग्रेस ने या किसी (व्हिसलब्लोअर) ने।’
सरकार, प्रशासन, पुलिस और कानून कई तरह से काम करते हैं। अक्सर एक-दूसरे से पूरी तरह अलग। या उल्टे। और सबकुछ एक तयशुदा नियम, कायदे, कानून के अंतर्गत। धाराएं। उपधाराएं। रेड विद्‌ सेक्शन बी। क्लॉज़ डी-3 । सब सेक्शन जी। हर बात कागज़ पर लिखे किसी नाॅर्म के तहत। फिर भी इतनी अलग। इतनी सब्जेक्टिविटि से भरी हुई। यही सरकारी जटिलता है जो घोटालों का कारण बनती है। यही घोटालों और घोटाला करने वालों को बेनकाब भी करती हैं।
ऐसा ही इस दावे के मूल में हो सकता है। जिस एफआईआर को मुख्यमंत्री ‘उन्होंने ही उजागर किया’ का आधार बनाकर कह रहे हैं- वह सौ प्रतिशत सच्चा दावा है। ऐसा ही हुआ। किन्तु कैसे? विस्तार से समाचार आ चुके हैं, इसलिए उनका जिक्र यहां व्यर्थ होगा। सिर्फ दो उदाहरण देखें। पूरा व्यापमं भ्रष्ट है। कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। पूरा व्यावसायिक परीक्षा मंडल इसमें कहीं न कहीं दोषी है। कोई भ्रष्टाचार के। कोई भ्रष्ट आचरण के। कोई लूट का हिस्सा बटोरने का। तो कोई भागते भूत का शेष हड़पने में। फिर भी व्यापमं ने अपने ही विरुद्ध पहली शिकायत पर एक जांच पैनल बना दिया। यह शिकायत उन्हीं डॉ. आनंद राय ने की थी, जो आज इस पूरे कांड को सामने लाने वाले तीन व्हिसलब्लोअर में से एक हैं। यहीं से 8 नाम मिले। 280 प्राॅक्सी। किसी के नाम पर परीक्षा दे रहे रैकेट का पहला सिरा। फिर क्राइम ब्रांच, इंदौर में डॉ. जगदीश सागर को पकड़ पाई। 317 नामों की लिस्ट मिली। फिर हजारों नाम खुले। केस दर्ज होना ही था। होता ही है। लेकिन ये सब संयोगवश हुआ है।
इसे आप सरकार की कार्रवाई कह सकते हैं। सख्ती बता सकते हैं। श्रेय ले सकते हैं।
किन्तु महीनों बल्कि कोई साल, सवा साल तक उन लक्ष्मीकांत शर्मा की गिरफ्तारी रोकने को क्या कहेंगे, जो पहले शिवराज सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री रह चुके थे? मेडिकल भर्ती घोटाले से शुरू सिलसिला जब सरकारी नौकरियों में शिक्षा, खाद्य, पुलिस सब इंस्पेक्टर नियुक्तियों को खोलने लगा तो मामले कम, मौतें ज़्यादा सामने आने लगीं। कैसा श्रेय?
फिर राज्यपाल रामनरेश यादव का नाम आया। सरकार और भाजपा अचानक से इस होड़ में लग गई है, राज्यपाल को संवैधानिक कवच मिला हुआ है। इसलिए वे कुछ नहीं कर सकते।
हालांकि राज्यपाल के रूप में यादव आज नहीं तो कल, बर्खास्त नहीं तो इस्तीफा देकर हटेंगे ही, तथापि दूसरे उदाहरण के रूप में यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि कैसे पूरी तरह शिवराज सरकार ही नहीं नरेन्द्र मोदी सरकार भी इसमें दोषी है। भाजपा भी इसमें पार्टी है।
केस की जांच के बाद जो एफआईआर हाईकोर्ट में दर्ज की गई, उसमें आरोपी क्रमांक 10 के रूप में रामनरेश यादव का नाम दर्ज था। आगे बाकायदा ‘गवर्नर’ लिखा था। हाईकोर्ट ने कहा, चूंकि उन्हें कन्स्टीट्यूशनल इम्यूनिटि प्राप्त है, इसलिए उन पर मुकदमा नहीं चल सकता। किन्तु यह भी कहा कि जब वे पद पर नहीं रहेंगे, तब यदि सरकार चाहे तो केस चल सकता है। यानी दोष मान लिया। शिवराज सरकार तत्काल इसी लाइन को आधार बनाकर केन्द्र को सिफारिश कर सकती थी कि यादव को बर्खास्त करें। उनके साथ बने अन्य राज्यपालों को निर्ममता से हटा चुके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस मामले में कुछ नहीं बोले। केन्द्र में सचिव जैसे पदों पर रह चुके यूपीए के राज्यपालों को अंडर सेक्रेटरी स्तर के अफसरों से फोन कर कहलवाया गया था कि फौरन राजभवन खाली कर दें। अन्यथा। वही सरकार यादव को बचाती रही। शिवराज सरकार चाहती तो केन्द्र से, पार्टी से या सीधे सुप्रीम कोर्ट से अपील कर सकती थी। किन्तु नहीं की। इसीलिए संदेह के घेरे में आ गई। इसीलिए अब यह आरोप सहन करना पड़ रहा है कि राज्यपाल को हटाते तो वह ‘कुछ विस्फोटक उगल देते।’
वैसे यह आरोप तार्किक नहीं है। अपने राजनीतिक जीवन के संध्याकाल में यादव क्या ‘विस्फोट’ करेंगे? कुछ नहीं कर सकते। वे तो स्वयं असहनीय आरोप, अपूर्णीय आघात और अनंत अपराध-बोध से ग्रस्त होंगे। आरोप यह कि राजभवन से संचालित हो रहा था व्यापमं घोटाला। आघात यह कि उनका बेटा इसमें आरोपी बना। इससे पहले कि कुछ बचाव हो पाता, उसका शव लखनऊ में मिला। रहस्यमय परिस्थितियों में। अपराध-बोध यह कि ऐसे संकट का सामना, इस उम्र में इतने नुकसान के साथ करना पड़ रहा है।
किन्तु उनका बने रहना तो यह सिद्ध करता है कि उन्हें कोई आघात नहीं पहुंचा। किसी अपराध का कोई बोध ही नहीं। केवल राजभवन की भव्य प्राचीरों का मोह।
यूं भी राज्यपाल के हटने से कुछ नहीं होगा। फोकस शिवराज सरकार से हटना नहीं चाहिए।
टीवी रिपोर्टर अक्षय सिंह की मौत से राष्ट्रीय और विश्व भर के मीडिया में आए इस घोटाले का सरगना कौन है? ऑर्गनाइज्ड क्राइम कहा जा रहा है। जबकि यह हाइली डिस्‌ऑर्गनाइज्ड, अनऑर्गनाइज्ड क्राइम है जिसे हर अफसर, हर कर्मचारी, हर संबंधित नेता और जो भी सरकार का घोषित-अघोषित हिस्सा होते हैं – वे अपनी-अपनी सुविधा से घोटाला कर रहे थे।
एक और अजीब पहलू है।
कहने को इसमें हर कोई अपना काम मुस्तैदी से कर रहा था। देखने पर इसमें हर कोई अपराधी लग रहा है। हर केस, हर वाकये के दोनों पक्ष मज़बूत हैं।
कोई 45 मौतें हो चुकी हैं। अब इनमें कोई समानता नहीं है। कोर्ट में पेश दस्तावेज़ 36 मौतों की पुष्टि करते हैं। इनमें 11 तो पहली एफआईआर दर्ज होने से पहले की हैं। इनमें सिर्फ चर्चित को लें तो नम्रता डामोर की लाश उज्जैन में रेलवे ट्रैक पर पड़ी मिली। पुलिस ने हत्या मानी। फिर आत्महत्या। फाइल बंद। फिर जांच। फिर बंद। जबकि पोस्टमाॅर्टम करने वाले डॉक्टर दम घोटे जाने की रिपोर्ट पर अड़े हुए हैं।
शिवराज कहते हैं कि सांच को आंच नहीं, हाथ कंगन को आरसी क्या। किन्तु सांच क्या है? क्योंकि सीबीआई भी यदि एसटीएफ की जांच को ही आधार मान लेगी -जैसा कि दो-दो पूर्व सीबीआई डायरेक्टर कह रहे हैं- तो फाइल आत्महत्या पर ही बंद होती जाएगी।
दूसरा चर्चित मामला जबलपुर मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. अरुण शर्मा का लें। वे 200 से अधिक दस्तावेज़ एसटीएफ को सौंप चुके थे। इस तरह वे शत-प्रतिशत अपराधियों के निशाने पर माने जा सकते हैं। किन्तु दिल्ली में हुई उनकी मृत्यु पुलिस को ‘नेचुरल’ लगी।
शिवराज ने अपने त्यागपत्र की मांग पूरी तरह ठुकराते हुए कहा है कि कांग्रेस के जमाने में तो सिगरेट पर लिखे नामों को प्रवेश व नियुक्ति मिल जाती थी। पूरी तरह सच है। किन्तु घोटाले का मुख्य हिस्सा 2007-08 से शुरू होता है। फिर घोटाले में कांग्रेस-भाजपा क्या? अगर सिगरेट की वो पन्नियां हों तो सामने लाएं और उन पर भी मुकदमें चलाएं। बल्कि जेल में डालें। घोटाले पार्टियों को मजबूत करते हैं, प्रदेश को बर्बाद और हम साधारण नागरिकों का भरोसा तोड़ते हैं। डराते हैं। और नैराश्य पैदा करते हैं कि कुछ सही हो नहीं सकता।
शिवराज ने अब जोर-शोर से यह मुद्दा उठाया है कि कांग्रेस व उनके विरोधी मध्यप्रदेश को बदनाम करना चाहते हैं। यह नरेन्द्र मोदी शैली है। गुजरात दंगों को उन्होंने ‘छह करोड़ गुजरातियों के गौरव’ से जोड़ा था। वे लगातार कहते थे कि मित्रो, यह गुजरात को बदनाम करने की साजिश है। बदनाम करने की न गुजरात में कोई साजिश थी। न मध्यप्रदेश में।
बदनाम इसलिए हो रहा है मध्यप्रदेश, चूंकि यहां इतना बड़ा ग़लत काम हुआ है। यह रक्तरंजित घोटाला है। मौतों के मामले में उत्तरप्रदेश के एनआरएचएम से तीन गुना भयानक। और घूस के मामले में बिहार के चारा घोटाले से चार गुना, या छह गुना बड़ा। कार्रवाई न करने, देखकर अनदेखा करने और जानकर अनजान बने रहने में शिवराज सिंह, डॉ. मनमोहन सिंह से आगे निकल गए। कोयला घोटाला डॉ. मनमोहन सिंह को इसी तरह संकट में रखे हुए है।
अंतर एक बड़ा है।
शिवराज राहत में हैं।
उन्हें सिर्फ एक रात, रातभर नींद नहीं आई।

मध्यप्रदेश के करोड़ों नौजवानों के लाखों सपने टूट गए। हमारे अच्छे, युवा डॉक्टरों से इलाज करवाने में डरेंगे लोग।
सब कुछ बदल देना चाहिए।
ताकि एक नई शुरुआत की जा सके। अभी।
बिहार चुनाव का इससे संबंध नहीं होना चाहिए।
नेतृत्व वही है जो हर अच्छे काम का श्रेय अपने साथियों को दे और हर बुरे काम, की जिम्मेदारी खुद ले। ऐसा नेतृत्व मिलना असंभव है। किन्तु पाना ही होगा। नेतृत्व में साहस होना चाहिए कि वह अपना दाग़, अपने सच से धो सके।
बशर्ते नेतृत्व पहले अपने दोष के कड़वे सच को, स्वयं मानने का साहस कर सके।