पेरिस क्लाइमेट डील में भारत-चीन पर सख्ती नहीं

वॉशिंगटन. डोनाल्ड ट्रम्प ने पेरिस क्लाइमेट डील से अमेरिका को बाहर रखने का फैसला किया है। ट्रम्प ने कहा कि पेरिस डील में भारत और चीन जैसे पॉल्यूटेड देशों के लिए कोई खास सख्ती नहीं की गई है। ट्रम्प ने ग्लोबल वॉर्मिंग रोकने के लिए किए जा रही धीमी कोशिशों को लेकर भी चिंता जताई।
195 देशों के इस समझौते से अमेरिका हट रहा है…
– न्यूज एजेंसी की खबर के मुताबिक ट्रम्प ने व्हाइट हाउस रोज गार्डन में 195 देशों के पेरिस समझौते को गलत करार देते हुए इससे हटने का फैसला किया।
– ट्रम्प ने कहा, “मैं डील को सपोर्ट कर अमेरिका को सजा नहीं दे सकता। डील से हमारे ऊपर इकोनॉमिक और फाइनेंशियल बोझ पड़ेगा।”
– “ये समझौता अमेरिका फर्स्ट के हमारे नारे पर खरा नहीं उतरता। डील एक तरह से बराक ओबामा के आत्म समर्पण करने जैसा था।”
– “यही नहीं समझौते में हमारे इकोनॉमिक विरोधियों भारत, चीन और यूरोप को कई सहूलियतें दी गई हैं।”
– ट्रम्प ने ये भी कहा, “मैं पिट्सबर्ग के लोगों को रिप्रेजेंट करता हूं, पेरिस के नहीं।”
– हालांकि ट्रम्प ने ये नहीं बताया कि डील से औपचारिक रूप से अमेरिका कब और किस तरह बाहर निकलेगा।
और क्या बोले ट्रम्प?
– “हम डील से बाहर आ रहे हैं। लेकिन इस बारे में बातचीत भी करेंगे। ये भी कोशिश करेंगे कि डील की शर्तें फेयर हों। अगर ऐसा हो पाता है तो इससे अच्छा कुछ नहीं होगा। अगर ऐसा नहीं हो पाता तो भी कोई दिक्कत नहीं।”
– अमेरिका के डील से अलग होने पर कई यूरोपीय देशों ने निंदा की है।
– फ्रांस, जर्मनी और इटली ने ज्वाइंट स्टेटमेंट में कहा, “एग्रीमेंट पर दोबारा बात नहीं हो सकती।”
– बता दें कि अमेरिका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जक (इमिटर) है। ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में सबसे बड़ा कॉन्ट्रीब्यूशन चीन का है।
– माना जा रहा है कि अमेरिका के बाहर होने से ग्लोबल टेम्परेचर कम करने की कोशिशों को झटका लगेगा।
कब हुआ पेरिस करार?
ग्रीन हाउस गैसों के इमिशन को घटाने के लिए दिसंबर 2015 में दुनियाभर के 195 देशों के बीच पेरिस में एक करार हुआ। तब अमेरिका के प्रेसिडेंट बराक ओबामा थे।
क्या था मकसद?
– अगर दुनियाभर में कार्बन इमिशन बढ़ता रहा तो धरती का टेम्परेचर भी बढ़ता रहेगा। इससे सी-लेवल बढ़ेगा। ज्यादा ताकतवर तूफान आएंगे। कई देशों में सूखा पड़ेगा। कहीं-कहीं बाढ़ आती रहेगी। इसी क्लाइमेट चेंज से बचने के लिए दुनियाभर के देश कार्बन इमिशन को कंट्रोल करने पर राजी हुए थे।
– पेरिस समझौते के पीछे मकसद यह था कि हर देश, चाहे वह अमीर हो या गरीब, कार्बन इमिशन कम करने के अपने टारगेट तय करेगा। यह तय किया गया था कि किसी भी तरह से ग्लोबल एवरेज टेम्परेचर को 2 डिग्री से ज्यादा बढ़ने से रोका जाए।
– इसके तहत पेरिस समझौते में शामिल अमेरिका समेत सभी डेवलप्ड और डेवलपिंग देशों के लिए यह जरूरी था कि वे हर पांच साल में अपना प्लान सौंपें और यह बताएं कि वे किस तरह से क्लाइमेट चेंज को रोकेंगे।
अमेरिका पर क्यों थीं नजरें?
– कार्बन इमिशन कम करने के लिए अमेरिका कई देशों की फंडिंग करने की बात कहता रहा है। अमेरिका की आबादी दुनियाभर की 4 फीसदी ही है लेकिन वह दुनियाभर में होने वाले कार्बन इमिशन में 33% की हिस्सेदारी रखता है।
अब अमेरिका के पीछे हट जाने से क्या होगा?
– पेरिस समझौते के तहत अमेरिका के लिए अब यह मजबूरी नहीं होगी कि वह तय प्लान के मुताबिक इमिशन कम करे। उसे दूसरे देशों की फंडिंग के लिए भी मजबूर नहीं किया जा सकेगा।

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