फोकस करना है तो डी-फोकस करना सीख लीजिए: ‘परीक्षा पर चर्चा’ में मोदी ने स्टूडेंट्स से कहा

नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तालकटोरी स्टेडियम में “मेकिंग एग्जाम फन- चैट विद पीएम मोदी’ प्रोग्राम में छात्रों के सवालों के जवाब दिए। मोदी से एक स्टूडेंट ने पूछा- अगले साल आपकी और मेरी परीक्षाएं हैं। मेरी 12वीं की और आपकी लोकसभा की परीक्षाएं। आपकी तैयारियां कैसी हैं, क्या आप नर्वस हैं? मोदी ने कहा- पहले तो मैं ये कहूंगा कि मैं आपका शिक्षक होता तो आपको जर्नलिस्ट बनने की सलाह देता। मोदी ने बच्चों से कहा कि अगर आपको फोकस करना है तो पहले डी-फोकस करना सीखिए। इस दौरान मोदी ने बच्चों के 10 सवाल के जवाब दिए।

बच्चों के 10 सवाल, मोदी के जवाब A से Z तक

1) दिल्ली से 11वीं की समीक्षा ने सवाल किया- ‘‘परीक्षा खत्म होने तक नर्वस रहते हैं, कैसे दूर करें?’’ एक और स्टूडेंट ने पूछा कि परीक्षा के वक्त हमें कुछ भी याद नहीं आता। हम आत्मविश्वास खो देते हैं। ऐसे समय में आत्मविश्वास बनाए रखें?

A. अपने को कभी कम मत आंको
– मोदी ने जवाब दिया, “ये सवाल बहुत से बच्चों ने पूछा है। मेहनत में कमी नहीं होती। अगर आत्मविश्वास नहीं है तो कितनी भी मेहनत करें, क्लासरूम में बैठने पर ये तो याद आता है कि किस किताब के किस पेज पर जवाब है, लेकिन एकाध शब्द याद नहीं आता। मैं बचपन में स्वामी विवेकानंद को पढ़ता था। वे कहते थे- अहम् ब्रह्मास्मि। यानी अपने आप को कम मत मानो। उस जमाने में 33 करोड़ देवी-देवताओं की चर्चा हुआ करती थी। वे कहते थे कि 33 करोड़ देवता तुम पर कृपा बरसा भी देंगे, लेकिन अगर तुममें आत्मविश्वास नहीं होगा तो 33 करोड़ देवी-देवता भी कुछ नहीं कर पाएंगे। बच्चे आमतौर पर सरस्वती की पूजा करते हैं। एग्जाम देने जाते हैं तो हनुमानजी की पूजा करते हैं। ऐसा क्यों करते हैं? मैं छोटा था तो मजाक उड़ाता था। मैं सोचता था कि हनुमानजी को इसलिए नमन करते हैं क्योंकि एग्जाम में चिट पकड़ जाए तो मास्टरजी को पता होना चाहिए कि ये हनुमानजी का भक्त है। ये स्कूलाें में मेरे चुटकुले का हिस्सा था। …मन में आत्मविश्वास जरूरी होना चाहिए। यह जड़ी-बूटी नहीं है। आत्मविश्वास लंबे भाषणों से भी नहीं आता। हमने अपने आप को कसौटी पर कसने की आदत डालनी चाहिए।’’

B. हर वक्त आगे बढ़ने की भावना होनी चाहिए
– पीएम बोले, ‘हर कदम पर कोशिश करते-करते आत्मविश्वास बढ़ता है। मैं जहां हूं, उससे मुझे ज्यादा है। इसके लिए जो करना पड़ेगा, वो मैं करूंगा। ये भाव होना चाहिए। अभी-अभी एक खबर मेरे दिल को छू गई। साउथ कोरिया में विंटर ओलिंपिक चल रहे हैं। उसमें कनाडा का एक नौजवान मार्क स्नोबोर्ड खेल रहा है। उसने ब्रॉन्ज मेडल जीता। 11 महीने पहले उसे भयानक इंजरी हुई थी। 15 से 20 फ्रैक्चर हुए। कोमा में था। लेकिन अब मेडल जीत लिया। उसने अपने फेसबुक पर दो फोटो शेयर कीं। एक अस्पताल का, दूसरा मेडल का। फोटो पर उसने लिखा है- धन्यवाद जिंदगी।’’

C. जिन बच्चों की भाषाएं नहीं बोल पाता, उनसे माफी मांगता हूं
– ‘‘स्कूल में जाते समय दिमाग से ये निकाल दीजिए कि कोई आपकी एग्जाम ले रहा है। कोई आपको नंबर देने वाला है। दिमाग में ये भर लीजिए कि आप ही आपके एग्जामिनर हो। आप ही अपना भविष्य तय करेंगे। मैं अपने हौसले के साथ चलूंगा, ये भाव मन मेें ले आइए। जीवन में सफलता में क्षमता-संसाधन सब हो, लेकिन आत्मविश्वास होना चाहिए। हमारे देश में 100 भाषाएं हैं, 1700 बोलियां हैं। इतनी विविधताएं हैं। बहुत से बच्चे मुझे ऑनलाइन सुन रहे होंगे। मैं उनकी भाषा में नहीं बोल पा रहा हूं। लेकिन मैं तमिल, मलयालम, कन्नड़ जैसी भाषाएं नहीं बोल पाता। उन सभी से मैं माफी चाहता हूं।’’

2) नोएडा से 10वीं की कनिष्का वत्स ने पूछा, ‘‘पढ़ाई से ध्यान भटक जाए तो क्या करें?’’ आईअाईटी-बीएचयू से प्रणव व्यास ने पूछा- जब हम खुद से खुश हो जाएं तो क्या करना चाहिए?

D. एकाग्रता को अपनी रेसिपी बना लें
– मोदी ने कहा, ‘‘बहुत लोगों को लगता है कि कॉन्संट्रेशन खास तरह की विधा है। ऐसा नहीं है। आपमें से हर व्यक्ति दिन में कोई न काई काम ध्यान से करता है। जैसे गाने के बोल को याद रखना। दोस्त से फोन पर बात करते वक्त अगर आपका प्रिय गाना चल रहा हो तो भी आप बातचीत में उलझ जाते हैं। यानी कॉन्संट्रेशन है। आप खुद का एनालिसिस कीजिए। वो कौन-सी बातें हैं, जिन्हें आप ध्यान से-मन से कर रहे हैं। उसके कारणों पर जाइए। उसे अपनी रेसिपी बना लें और पढ़ाई में अप्लाई करें तो कॉन्संट्रेशन का दायरा बढ़ता जाएगा। खुद को जांचना-परखना चाहिए।’’

E. सचिन ने कहा था- केवल खेलता हूं, बाकी सब भूल जाता हूं
– ‘‘बहुत लोग कहते हैं कि हमें कुछ याद नहीं रहता। लेकिन किसी ने आपको 10 वाक्य बुरे बोल दिए तो आपको 6 साल बाद भी दसों के दसों वाक्य याद रहेंगे। इसका मतलब आपकी मेमोरी पावर में दिक्कत नहीं है। जिसमें आपका दिल लग जाए, वो चीजें जिंदगी का हिस्सा बन जाती हैं। योग को लोग फिजिकल एक्सरसाइज मानते हैं। ऐसा होता और ये बॉडी बेंडिंग का खेल होता तो सारे सर्कस वाले योग करते। लेकिन ये कॉन्संट्रेशन का मामला है। एक बार मैंने मन की बात की थी। महान खिलाड़ी सचिन तेंडुलकरजी ने एक बच्चे काे जवाब दिया था कि जब मैं खेलता हूं तो इसमें दिमाग नहीं खपाता कि पहले का बॉल कैसा था, मैं खेल पाया या नहीं। मैं उस वक्त उसी बॉल को खेलता हूं जो आने वाली है। बाकी सब भूल जाता हूं।’’

F. अतीत के बोझ में भविष्य के सपने कुचले जाते हैं
– मोदी बोले, ‘‘ऐसा नहीं है कि अतीत का महत्व नहीं है। लेकिन अतीत जब बोझ बन जाए तो भविष्य के सपने रौंद जाते हैं। वर्तमान में जीने की आदत जरूर है। आंखें किताब पर हैं, एक-एक पन्ना पढ़ रहे हैं। लेकिन दिमाग कहीं और है। आप ऑफलाइन हैं। इसलिए आप किताब से कनेक्ट नहीं होते। अापमें से बहुत लोगों को पानी का टेस्ट पता होगा। कभी पानी का टेस्ट एंजॉय कीजिए। ये कॉन्संट्रेशन है।’’

3) नेहा शर्मा ने पूछा, ‘‘तुलना के चलते मैं तनाव में रहती हूं। इससे मेरा आत्मविश्वास कमजोर होता है।’’ वहीं, 9वीं की स्टूडेंट अरुणा श्रीवात्सव ने कहा कि दोस्तों से आगे निकलने की होड़ ज्यादा है। इससे कैसे बचें? एक और स्टूडेंट ने पूछा कि कॉम्पीटिशन बढ़ने से दबाव बढ़ जाता है, क्या करें?

G. दुश्मन को अपने मैदान में लाओ और फिर मारो
– मोदी ने कहा, ‘‘खेल या युद्ध के विज्ञान को समझिए। आप अपने मैदान में खेलिए। अगर आप सामने वाले के मैदान में खेलने के लिए जाते हैं तो बड़ा रिस्क ले लेते हैं। दुश्मन को अपने ही मैदान की तरफ खींचकर लाओ और मारो, युद्ध में भी यही समझाया जाता है। दूसरों की सोच, परवरिश, माहौल, सपने, रूचि अलग हैं। लेकिन आप स्वतंत्र व्यक्ति हैं। आपको उसके पूरे ईको-सिस्टम का पता नहीं है। ऐसे में आप निराशा में आ जाता हो। पहले तय करो कि आपके भीतर क्या है? आप किस चीज में मजबूत हो? खेल जगत के बड़े नामों को देखिए। कोई उनकी डिग्री पूछता है क्या? खुद को न जानना समस्या का कारण होता है।’’

H. अपने आप से प्रतिस्पर्धा कीजिए
– प्रधानमंत्री ने कहा, “जब भी आप कॉम्पीटिशन में उतरते हैं तो आपको तनाव महसूस करना होता है। दूसरा चार घंटे पढ़े तो आप भी ऐसा ही करते हो। आप खुद को देखो, समझो। प्रतिस्पर्धा अपने आप हो जाएगी। लोगों को आपकी प्रतिस्पर्धा में आने दो। आप किसी की प्रतिस्पर्धा में मत जाओ। लोगों को आपको मॉडल बनकर प्रतिस्पर्धा में उतरने दीजिए। खुद से स्पर्धा कीजिए। खुद के पैरामीटर बनाइए। डायरी लिखिए। ये लिखिए कि कल से मैं दो कदम आगे निकला या नहीं? इसके बाद आपको किसी की शाबाशी की जरूरत नहीं है। इससे नई ऊर्जा निकलेगी। आप प्रतिस्पर्धा के चक्र से निकल जाइए। खुद से स्पर्धा करें। एक ओलिंपियन बुका हैं। उन्होंने अपने ही रिकॉर्ड 36 बार तोड़े। वे औरों को देखते तो वहीं अटक जाते।’’

4) दीपशिखा ने पूछा- परीक्षा के दौरान माता-पिता प्रेशर डालते हैं। जब बच्चे 80 से 90 फीसदी नंबर लाते हैं तो उन्हें संतोष नहीं होता। ये सही है या गलत? बीए की स्टूडेंट लीला बानो ने पूछा- माता-पिता की उम्मीदों को कैसे पूरा करें? ऐप के जरिए एक सवाल आया कि सोशल प्रेशर से कैसे उबरें?

I. माता-पिता की शिक्षा पर शक मत करिए
– मोदी ने मजाकिया अंदाज में कहा, ‘‘आप लोग चाहते हैं कि आज मैं आपके पैरेंट्स की क्लास लूं? मेरी सोच थी कि स्टूडेंट्स के सवाल आएंगे। लेकिन ये सवाल ऐसा है कि मां-बाप भी ऐसा ही सोचते होंगे कि बच्चों को कैसे सुधारें? पहली बात ये कि माता-पिता के इरादों पर शक ना करें। वे भी हमारे लिए जिंदगी खपा देते हैं। वे कोई अच्छी चीज इसलिए नहीं खरीदते, क्योंकि बच्चों की फीस भरनी है। कहीं बाहर नहीं जाते, क्योंकि बच्चों की परीक्षा है। माता-पिता का सपना होता है, अपने बच्चों को कुछ बनते देखने का। इसलिए उनकी निष्ठा पर शक नहीं करना चाहिए।’’

J. अपने सपने बच्चों में ना भरें
– ‘‘भरोसा करेंगे तो अंडरस्टैंडिंग का दरवाजा खुलता है। डर से पढ़ाई करने का माहौल अच्छा नहीं है। ये परिवार में तबाही ला देता है। कई माता-पिता ऐसे होते हैं, जिन्होंने बचपन में कुछ सपने बोए होते हैं। वे अपने सपने पूरे नहीं करते तो अपने बच्चों में उन सपनों को ट्रांसप्लांट करते हैं। माता-पिता अपने बच्चों की क्षमता-परवरिश देखे बिना अपने अधूरे सपने पूरे करते हैं।’’

K. अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से ना करें
– ‘‘कभी-कभी इच्छाओं के भी भूत होते हैं। लेकिन डायलॉग करना चाहिए। माता-पिता जब अच्छे मूड में हों, तब करनी चाहिए। ये बात हिंदुस्तान के बच्चों को सिखानी नहीं पड़ती। भारत का बच्चा जन्मजात पॉलिटिशियन होता है। उसे पता होता है कि पापा नहीं मानेंगे, इसलिए दादी से कहो। मैं अभिभावकों से कहना चाहूंगा कि पढ़ाई को सोशल स्टेट्स बना दिया है। उन्हें लगता है कि दूसरे के बच्चे आगे पहुंच गए, लेकिन हमारे बच्चे नहीं कर पाए। वे तय कर लेते हैं कि हमारे बच्चे बेकार हैं। पिताजी पत्नी को डांटते रहते हैं। घर पहुंचकर बच्चे मिल जाएं तो खेल खत्म। इसलिए इसे सोशल स्टेटस मत बनाइए। दूसरों के बेटे के सामर्थ्य से अपने बेटे की तुलना मत कीजिए। हर बच्चे में परम शक्ति होती है। बच्चे ये नहीं पूछ पाते कि माता-पिता को कितने नंबर आए थे?’’

5) अभिनव ने पूछा कि परीक्षा में खेलने का मन करता है, तो क्या करें? वहीं, सलोनी ने पूछा कि फोन का कम से कम यूज कैसे करें?

L. फोकस करना है तो पहले डी-फोकस करना सीखें
– मोदी ने कहा, ‘‘फोकस करना है तो डी-फोकस करना सीख लीजिए। किसी बर्तन में दूध भरना है तो एक सीमा तक भरेगा। अंदर से कुछ खाली करना सीखें। फोकस करते रहने से चेहरे पर भी तनाव आएगा। मेरे कुछ साथी मुझे हर बार कहते हैं कि आप टीवी पर दिखते हो तो हमेशा गंभीर क्यों रहते हैं। जब मैं बिना काम किसी समारोह-मंच पर हूं तो मैं एकदम सोचने लग जाता हूं। लोग कहते हैं टीवी बंद करो, मोदी ऐसा ही दिखता है। लेकिन मंच पर आकर मैं रिलैक्स हो जाता हूं। जैसे ही डी-फोकस होता हूं, सबकुछ सरल हो जाता है। चौबीसों घंटे परीक्षा, प्रैक्टिकल नहीं सोचना चाहिए। आपका डिसेक्शन कर दें तो यही शब्द निकलेंगे।”

M. पंच महाभूतों से जुड़ें, ये ऊर्जा देंगे
– “हमारे शास्त्रों में पंचमहाभूत की चर्चा है। पृथ्वी, आकाश, जल, वायु, अग्नि। आप कितना ही थककर आएं, पानी से मुंह धो दीजिए, खिड़की खोलकर हवा लीजिए तो फ्रेश महसूस करेंगे। पंचमहाभूतों से संपर्क बनाएं रखेंगे तो ऊर्जा महसूस करेंगे। एग्जाम से पहले कर्फ्यू जैसा माहौल हो जाता है। टीवी बंद, बातचीत बंद। आप जिंदगी की जिन आदतों के साथ पले-बढ़े हैं, आप उनकी मात्रा कम कर सकते हैं लेकिन उससे अलग नहीं हो सकते। खेलने का शौक है, खेलिए। गीत गाने का शौक है, गाइए। सब चीजों को काटकर अलग मत कीजिए। ऐसा करेंगे तो फोकस की संभावना ही नहीं बचेगी।’’

6) दीक्षि ग्रोवर ने पूछा, “परीक्षा के तनावपूर्ण दिनों में योग हमारी किस तरह सहायता करता है, आप खुद योग करते हैं… तो कुछ आसन बताइए? आप ईक्यू और आईक्यू में संतुलन करना बताएं?

N. संतुलित विकास के लिए IQ और EQ जरूरी
– मोदी ने कहा, “आईक्यू और ईक्यू हमने सुना है। लेकिन, किसी को पूछोगे कि ये क्या है तो कहेंगे कि सुना है। मैं सरल रीति से बताता हूं। एक तो ये बताया जाता है कि आईक्यू के खिलने का सबसे बड़ा अवसर होता है, ज्यादा से ज्यादा 5 साल के पहले ही पनपना शुरू हो जाता है। बाद में उसका प्रगतिकरण होता है। कोई मां बच्चे को झूले में सुलाती है, झूले में घुंघरू बंधा है। 2-5 महीने का बच्चा होगा, वो देखता है कि मां ने ऐसा किया तो घुंघरू की आवाज आई। वो अपने पैर ऊपर करके घूंघरू से आवाज लाने की कोशिश करता है। इसे आईक्यू कहते हैं। वो रोता नहीं है , उसका पूरा ध्यान घुंघरू पर रहता है। ये है आईक्यू।
– “अब मान लीजिए मां को बहुत काम है, सो जाए बच्चा तो अच्छा है। गाना, सीडी झूले के पास लगा देती है ताकि बच्चा सो जाए। लेकिन, बढ़िया से बढ़िया गायिका या शब्द हों, बच्चा रोना बंद नहीं करता है। मां किचन से आती है और खुद अपनी आवाज से गाना बंद करती है और बच्चा सो जाता है, ये ईक्यू है। ये इमोशंस हैं, वो कनेक्ट हैं। इसलिए आईक्यू और ईक्यू दोनों का संतुलित विकास जरूरी है। ईक्यू का बहुत बड़ा रोल होता है।”
– “ये इन्सिपरेशन का सबसे बड़ा सोर्स होता है और रिस्क लेने की कैपेसिटी बढ़ाता है। अगर हम ब्लड डोनेशन के लिए जाते हैं, मैं जब जाता हूं और पता चलता है कि मैंने जिसे ब्लड दिया, उसकी जान बच गई। मेरा आईक्यू ईक्यू में बदल गया।”

O. जन्मदिन पर अनाथ आश्रम और वृद्धाश्रम जाएं बच्चे
– “मेरे एक टीचर का नियम था कि किसी का जन्मदिन हो तो वो बच्चों से आग्रह करते थे कि परिवार के साथ वृद्धाश्रम, अस्पताल या अनाथालय में होकर आओ, तब जन्मदिन मानूंगा। मैंने पूछा तो टीचर ने कहा कि आईक्यू तो मैं पढ़ा लूंगा, लेकिन उसका ईक्यू बढ़ाने के लिए ये चीजें जरूरी हैं इसलिए मैं उन्हें ऐसी जगहों पर जाने के लिए प्रेरित करता हूं। जन्मदिन पर बच्चा केंद्रित होता है और तब वो जो करता है, बहुत ताकत से करता है। हमारे लिए जरूरी है कि हम जीवन में ऐसा कुछ समय ऐसे लोगों के बीच बिताएं। अखबार डालने वाले का नाम नहीं जानते होंगे, दो दिन नहीं आया तो उससे नहीं पूछा कि बीमार तो नहीं हो गए। ड्राइवर, दूधवाले का नाम पूछा नहीं। आप उससे पूछिए तो आपका सोचने का तरीका बदल जाएगा। इन लोगोें से जितना संपर्क में आएंगे, उससे उतना ही ईक्यू शार्प होगा। आईक्यू सक्सेज देता है, लेकिन सेंस ऑफ विजन देने में ईक्यू अहम है।”

P. जिस योग में सहूलियत हो, वही करने लगें
– मोदी ने कहा, “योग आसन के संबंध में भ्रम है कि इस आसन से ऐसा होता है, उस आसन से वैसा होता है। ये विज्ञान है। आपको जो आसन अच्छा लगे और कंफर्ट दे उसे शुरू करें। दुनिया के कई परिवारों में बच्चों की हाईट बढ़ाने के लिए ताड़ासन को रेगुलराइज कर दिया गया है। मन में तो ये रहता है कि ताड़ासन कर रहा हूं तो मेरी हाईट बढ़ेगी। ये प्रक्रिया है। ये सिखाता है कि शरीर मन औऱ बुद्धि साथ कैसे काम कर रहे हैं, ठीक कर रहे हैं या नहीं। मैं खड़ा हूं तो आप कहेंगे कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हूं। लेकिन, अगर बारीकी से देखोगे तो आप अपने पैरों पर नहीं खड़े हो। बॉडी को देखो तो पता चलेगा कि वेट कमर पर है। फिर देखोगे कि बटक में है, फिर देखोगे तो पता चलेगा कि नी और एंकल पर है। बाद में पता चलेगा कि तलवे पर वेट आता है।”
– “ये आप सीख गए तो आपको रिलैक्सेशन सीख जाओगे। योग निद्रा के द्वारा कम नींद भी आपको पर्याप्त नींद देती है। नींद बहुत जरूरी है। इसका मतलब ये नहीं है कि सोते रहें और घर में सब कहें कि कुंभकर्ण हैं। मैं इतना सारा जिम्मा लेकर काम कर रहा हूं लेकिन बिस्तर पर जाने के बाद 30 सेकंड के भीतर सो जाता हूं मैं। लेकिन उठता हूं तो क्वॉलिटी नींद पूरी करके उठता हूं। आपसे भी आग्रह करूंगा कि अपनी नींद को भी वैरिफाई करिए। यूट्यूब पर भी मिल जाएगी। सोते-सोते ट्रैवलिंग करना होता है। एक-दो मिनट में गहरी नींद में चले जाते हैं। जो आपको कंफर्ट लगे उसी को करें। आप पोजिशन पाने के लिए कोशिश मत कीजिए।”

7) कुशाग्र पायल ने पूछा, परीक्षा देने वाले बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए शिक्षक क्या रोल निभाएं?

Q. पहले टीचर परिवार का हिस्सा होते थे
– मोदी ने कहा, “वक्त काफी बदल चुका है, जो मैंने देखा है। परिवार में कुछ अच्छा बनता था तो मां बोलती थी कि अपने टीचर को कुछ दे आओ। मेरे टीचर का घर ज्यादा दूर नहीं था, ऐसा करता था। टीचर एक तरह से फैमिली मेंबर हुआ करता था। कभी-कभी मां-बाप जो बात बच्चों को नहीं बता पाते थे, उसे बताने के लिए वो टीचर से कहते थे। मां-बाप का टीचर पर भरोसा होता था। आज हालात ये है कि बहुत से मां-बाप टीचर को पूरी तरह जानते नहीं है। तब जानते हैं जब बच्चा आकर शिकायत करेगा कि टीचर ने डांटा है। जैसे परिवार में फैमिली डॉक्टर होता है, वैसे ही टीचर पूरे परिवार के लोगों का सिस्टम जानता था और उसी के अनुसार बच्चों को गाइड करता था। आज वो खत्म हो गया है। मैं चाहता हूं कि टीचर स्टूडेंट ही नहीं, उसके पूरे ईको सिस्टम से जुड़ें। तब उन्हें पता चलेगा कि बच्चे को कैसे ट्रीट करना है।”

R. गुरु-शिष्य परंपरा को जीवित रखें
– “दूसरा हम लोगों ने गुरु शिष्य परंपरा को जाना है। एक स्कूल में मुझे बुलाया गया, मैंने कहा कि मैं टीचर्स से बात करना चाहूंगा। मैंने टीचर्स से पूछा कि आप बताइए कि आपके यहां से निकले हुए हजारों विद्यार्थी हैं, इनमें कितने हैं, जिन पर आपको गर्व होता है। आपको कोई याद है क्या? मुझे कोई भी टीचर जवाब नहीं दे पाया। मैंने कहा कि आप कितने डिग्री लेकर निकले की बजाय कितनों की जिंदगी बनी, ये ध्येय नहीं है तो शिक्षा अधूरी है। मैंने पूछा कुछ स्टूडेंट हैं जो जेल में है। उनका सिर नीचे झुक गया। अगर मेरे पास पढ़ा हुआ बच्चा किसी बुरे काम में दिखा तो टीचर के तौर पर चोट पहुंचे और अच्छा काम करे तो दिन सुहाना हो ऐसे टीचर होने चाहिए। मैंने ऐसे टीचर देखे हैं।’

S. शिक्षकों के सम्मान से संतोष होता है
– “मैं घर छोड़कर 30-40 साल बाहर रहा और गुमनामी की जिंदगी जी। सीएम बनने के बाद मैंने अपने टीचर्स की लिस्ट बनानी शुरू की। सबको एक कार्यक्रम में इकट्ठा किया और सार्वजनिक तौर पर उनका सम्मान किया। मेरे मन में एक संतोष हुआ। मेरे माता-पिता के बाद यही तो हैं, जिनसे मैं खुलकर बात कर सकता हूं। खेल की दुनिया में भी टीचर होते हैं। वहां गुरू-शिष्य परंपरा होती है। ये गुरू ऐसे होते हैं, जो खुद की संतानों के लिए भले ही कुछ करें, लेकिन अपने शिष्य के लिए वो अपना जीवन खपा देते हैं। रेसलर के लिए गुरू 4 बजे उठकर मेहनत करते हैं। ये जो संबंध है। जिसमें गुरू अपना जीवन खपा देते हैं, वो आज भी मैं खेल जगत में देखता हूं।”

8) जय मिस्त्री ने पूछा कि परीक्षा से 24 घंटे पहले टाइम मैनेजमेंट कैसे करें?

T. प्राथमिकताएं पता नहीं है इसलिए टाइम मैनेजमेंट भी नहीं है
– मोदी ने कहा- “लोगों से पूछो तो कहते हैं कि मेरे पास टाइम नहीं है। किसी को एक्स्ट्रा नहीं मिला है। टाइम के मिस मैनेजमेंट की सिद्धांत आपकी प्राथमिकताओं के बारे में आपका अज्ञान है। आपको पता होना चाहिए कि मैं किन चीजों में समय को बर्बाद करता हूं। जो करना चाहिए वो करता नहीं और जो करना चाहिए वो नहीं करता। जरूरी नहीं कि एक ही टाइमटेबल 365 दिन काम आए।”

U. दो डायरियां बनाएं और महीनेभर बाद उन्हें पढ़ें
– “वक्त के मुताबिक फ्लैक्सिबिलिटी चाहिए। सहज लचीलेपन के साथ वातावरण के साथ हम जैसे माहौल में जी रहे हैं, उसमें कम से कम उलझनों के बीच संतुलन बनाए तो दिनचर्या ठीक हो जाएगी। डेली डायरी लिखने की आदत नहीं हो, ऐसे बहुत लोग होंगे। महीने भर आप अपने लिए लिखिए। रात को लिखिए कि कल क्या-क्या करना है। दूसरे दिन दूसरी डायरी लिखिए, जैसे जैसे करते जाएं लिखें। महीने भर दोनों डायरियों को अलग रखिए और मैच रखिए। आप देखोगे कि 80 फीसदी चीजें वो की होंगी, जो तय करने के बाद भी विपरीत कीं। किसी को पूछने की जरूरत नहीं है और आप ही खुद को करेक्ट कर सकते हो। दोनों डायरियों को आप महीनेभर बाद देखिए सारे सुधार खुद हो जाएंगे।”

9) गौरव सिंह ने पूछा- मेरा सवाल है कि हमारे पास करियर अपॉर्चुनिटीज बहुत हैं। इतनी संभावनाओं में हम कन्फ्यूज हो जाते हैं कि करियर क्या चुनें?

V. बनने का सपना निराशा की गारंटी है
– मोदी ने कहा, “बहुत ही कम शब्दों में जवाब दूंगा। सारी समस्या की जड़ क्या है। आप कुछ बनना चाहते हैं, एक बार मन में तय कर लीजिए कि मैं जिंदगी में कुछ करना चाहता हूं। जब तक बनना चाहता हूं सोचते हैं, तो आप अपनी स्वतंत्रता को खो देते हैं, समर्पित कर देते हैं, आप वो बनने के लिए गुलाम बन जाते हैं। बनने के सपने निराशा की गारंटी हैं।”

W. क्राइंग नहीं, प्राइम की दुनिया चाहिए
– “आपने सोचा डॉक्टर बनूंगा, इंजीनियर बन गए। समाज में प्रतिष्ठा है, लेकिन रोते रहते हैं। क्राइंग की नहीं, प्राइम की दुनिया चाहिए। करने का सपना देखने पर आपको सैटिस्फैक्शन मिलता है। इसमें नए इरादे औऱ नया करने का मन करता है। आप करते चलते हैं और बनते चलते हैं। करते-करते बन गए उसका सैटिस्फैक्शन और कॉन्फिडेंस अलग होता है। करियर में कुछ बनना तय करके आप गुलाम हो जाते हैं, सबकुछ उसी में सिमट जाता है। करने का इरादा होगा तो सारे रास्ते खुल जाते हैं। आप मन में करने का इरादा रखिए, स्वतंत्रता को इंजॉय करिए, वो नई ताकत देगी।”

10) गिरीश सिंह ने पूछा, मुझे लगता है कि अगले साल हम दोनों की ही बोर्ड की परीक्षा है। मेरी 12वीं की है और आपकी लोकसभा की परीक्षा है। आपकी क्या तैयारी है, आप नर्वस हैं?

X. मैं टीचर होता तो आपको जर्नलिस्ट बनने को कहता
– प्रधानमंत्री बोले, “मुझे पक्का लगता है कि मैं आपका(गिरीश) टीचर होता तो मैं आपको गाइड करता कि आप जर्नलिज्म में जाइए। क्योंकि, ऐसा लपेटकर सवाल पूछने की ताकत तो जर्नलिस्ट में ही होती है। मैं हमेशा ये मानता हूं कि आप पढ़ते रहिए, सीखने की कोशिश करिए। पूरा फोकस लर्निंग पर रखिए, ऊर्जावान बनिए। यही जीवन का धर्म बनाकर रखिए। एग्जाम, रिजल्ज बाईप्रोडक्ट होना चाहिए। आपने काम किया है, जो रिजल्ट आएगा आएगा।”

Y. हम लोगों का 24 घंटे एग्जाम होता है
– “अंक के हिसाब से चलने से शायद उन चीजों को नहीं हासिल कर सकते हैं, जो करना चाहते हैं। राजनीति में भी मैं इसी सिद्धांत पर चलता हूं कि सवा सौ करोड़ भारतीयों के लिए जितना समय, ऊर्जा और सामर्थ्य है, सबकुछ सवा करोड़ देशवासियों के लिए खपाता रहूं। समय का शरीर का कण-कण, समय का क्षण-क्षण उनके लिए लगाता रहूं। चुनाव आएंगे, जाएंगे। दूसरा, हम लोगों की स्थिति ऐसी है कि दिन में 24 घंटे एग्जाम होता है और किसी हिंदुस्तान के कोनों में एक नगरपालिका का चुनाव हार गए तो ब्रेकिंग न्यूज होती है, ब्लो ऑन मोदी।”

Z. सवा सौ करोड़ भारतीयों का आशीर्वाद मुझे पास कराएगा
– प्रधानमंत्री ने कहा, “कभी कभार मैं राजनीति में बहुत देर से आया, मैं अभी भी राजनीतिक व्यवस्था में हूं, लेकिन स्वभाव से इसमें नहीं हूं। मेरे नेचर में यही है कि कुछ करना है। जब राजनीति में नहीं था तो जनसंघ नाम की पार्टी थी और दीपक नाम का निशान था। दीवार पर दीपक पेंट करने के लिए भी गरीबी की वजह से मुश्किल होती थी। 103 उम्मीदवार खड़े किए, उन सबमें से 99 की जमानत जब्त हो गई। 4 की बची तो पार्टी की गई, पूछा तो कहा कि इनकी डिपॉजिट बच गई है। ये मिजाज वहां से यहां तक पहुंचाता है। अटल जी कहते थे कि हार नहीं मानूंगा। ये जिजीविषा ही यहां पहुंचाती है। मेरे एग्जाम के लिए सवासौ करोड़ भारतीयों का आशीर्वाद मेरे साथ है, वही मुझे पास कराएगा।”

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