बिना गवाही हुई थी भगत सिंह को फांसी, बेकसूर बताने के लिए अब PAK में पिटीशन

लाहौर। पाकिस्तान की कोर्ट में सोमवार को एक पिटीशन दायर की गई। इसमें शहीद-ए-आजम भगत सिंह को बेकसूर साबित करने की मांग करती अर्जी पर जल्द सुनवाई की दरख्वास्त की गई है। बता दें कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को अंग्रेज अफसर जॉन पी सैंडर्स की हत्या के आरोप में फांसी की सजा सुनाई गई थी। तीनों को 23 मार्च 1931 को फांसी पर लटकाया गया था। यह पिटीशन उसी फैसले के खिलाफ दायर की गई है। बेंच भगत सिंह को सैंडर्स हत्याकांड में बेकसूर साबित कर सकती है क्योंकि 450 गवाहों को सुने बिना उन्हें फांसी दी गई थी।
क्या है पूरा मामला?
>एडवोकेट इम्तियाज राशिद कुरैशी ने यह पिटीशन दायर की है। कुरैशी भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के चेयरमैन भी हैं। कुरैशी का कहना है कि कोर्ट की कम्प्लीट बेंच इसकी सुनवाई करे।
>कुरैशी के मुताबिक, ‘शुरू में भगत सिंह को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। लेकिन बाद में एक मनगढ़ंत मामले में फांसी की सजा सुना दी गई थी। भगत सिंह आज भी सिर्फ सिखों और मुसलमानों में नहीं, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में सम्मानित हैं।’
>पिटीशन में उन्होंने कहा है कि भगत सिंह से जुड़ा मामला राष्ट्रीय महत्व का है। वे फ्रीडम फाइटर थे। बंटवारे से पहले भारत की आजादी के लिए लड़े थे। पाकिस्तान के कायद-ए-आजम मुहम्मद अली जिन्ना ने भी उन्हें दो बार श्रद्धांजलि दी थी।
>लाहौर हाई कोर्ट के जज शुजात अली खान ने मामले में आखिरी सुनवाई मई 2013 में की थी। उन्होंने मामला बड़ी बेंच को सौंपने के लिए चीफ जस्टिस को भेज दिया था। पिछले साल पुलिस ने 1928 में सैंडर्स हत्याकांड की मूल एफआईआर की कॉपी कोर्ट के आदेश पर कुरैशी को दी थी।
>भगत सिंह का नाम उस एफआईआर में नहीं था, जिसकी वजह से उन्हें 1931 में महज 23 साल की उम्र में फांसी पर लटकाया गया था।
>लाहौर पुलिस ने फांसी के 83 साल बाद कोर्ट के आदेश पर उस मुकदमे की एफआईआर की कॉपी अनारकली थाने से ढूंंढ कर निकाली। यह एफआईआर उर्दू में है। इसे 17 दिसंबर 1928 को शाम 4:30 बजे ‘अज्ञात बंदूकधारी’ के खिलाफ दर्ज करवाया गया था।