भाजपा ने 45 साल में इस सीट पर पहली बार दर्ज की जीत

भोपाल. मध्यप्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा ने बढ़त बरकरार रखी है। 11 अगस्त को हुए 43 निकायों के परिणाम बुधवार को जारी हुए। इसमें भाजपा को 25, कांग्रेस को 15 और निर्दलीय को 3 सीटें मिली हैं। नगरीय निकायों की 43 सीटों में 37 पर आम चुनाव हुआ था। 4 पर उप चुनाव और 2 पर राइट टू रिकॉल के तहत हटाए गए प्रत्याशी को लेकर चुनाव हुआ।
37 नगरीय निकायों के आम चुनाव में भाजपा ने 22 सीटें जीती है, जबकि 2012 में हुए चुनाव में उसे 25 सीटें मिली थी। इस तरह इन चुनावों में पार्टी को तीन सीटों का नुकसान हुआ है। कांग्रेस ने पिछले चुनाव में 6 सीटें जीती थीं। अब उसके पास सीटों की संख्या बढ़कर 12 हो गई है। यानी कांग्रेस को सीधे-सीधे 6 सीटों का फायदा हुआ है। निर्दलीय को महज 3 सीटों पर ही जीत मिली है। पिछले चुनाव 6 सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी जीते थे।
भाजपा ने जीतीं ये सीटें
जैतवारा, आठनेर, हर्रई, कैलारस, कोतमा, रानापुर, डिंडोरी, भिकनगांव, मंडलेश्वर, थांदला, पेटलावाद, चंद्रशेखर नगर, डबरा, नेपानगर, चिचौली, नैनपुर, पाली, बम्हनी, बंजर, बिछिया, जोबट, छनेरा, बुढ़ार, जयसिंह नगर, बिजूरी और शहडोल।
 इन पर जीती कांग्रेस
मंडला, सैलाना, शहपुरा, निवास, महेश्वर, सनावद, बैहर, अलीराजपुर, झाबुआ, दमुआ, जुन्नारदेव, मोहगांव और सौंसर जीती है।(शमशाबाद और गाडरवारा खाली कुर्सी भरी कुर्सी)
भाजपा से छीनीं ये सीटें:झाबुआ, अालीराजपुर, महेश्वर, दमुआ, सौंसर और मोहगांव।
खाली कुर्सी भरी कुर्सी पर कांग्रेस का कब्जा :खाली कुर्सी भरी कुर्सी के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस ने कुर्सी बचा ली है। विदिशा जिले की शमशाबाद से कांग्रेस अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे। इसी तरह नरसिंहपुर जिले की गाड़रवाड़ा में नगर पालिका अध्यक्ष की अपनी कुर्सी बचाने में सफल रही।
भाजपा ने 45 साल में पहली बार कैलारस और डबरा में फहराया परचम
मुरैना जिले की कैलारस नगर परिषद का गठन 45 साल पहले हुआ था। इस सीट पर पहली बार भाजपा ने जीत दर्ज की है। कैलारस सीट पर बीते चुनाव में माकपा प्रत्याशी जीते थे। इसी तरह डबरा सीट भी पहली बार भाजपा ने जीती। डबरा कांग्रेस का परंपरागत गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन बीते चुनाव में यहां बसपा चुनाव जीती थी। पहली बार यहां भाजपा जीती है।
जिन निकायों के चुनाव हुए हैं वहां पार्टी ने प्रचंड बहुमत प्राप्त किया है। यह भाजपा के कार्यकर्ताओं की जीत है। साथ ही जनता ने सरकार के प्रति विश्वास व्यक्त किया है।
-शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री
भास्कर विश्लेषण- न जीत की खुशी और न हार का गम, पर वोटर्स ने दबाया अलर्ट का बटन
 राज्य के 43 नगरीय निकायों में हुए चुनाव के परिणाम ने भाजपा को खुलकर जश्न मनाने का मौका नहीं दिया। कांग्रेस भी यह दावा नहीं कर सकती कि उनका जनाधार वापस हो रहा है। इस चुनाव में भाजपा के 25 भाजपा और 15 कांग्रेस अध्यक्ष जीत कर आए हैं। ऐसे में न तो भाजपा कह सकती है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का जादू चल गया और ना ही कांग्रेस कह सकती है कि मप्र में शिवराज विरोधी लहर है। इतना जरूर है कि पिछले चुनाव की तुलना में कांग्रेस को इस बार ज्यादा सीटें मिलीं। लेकिन इससे यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि भाजपा विरोधी लहर चल रही है।
मतदाताओं ने स्पष्ट संदेश दिया है कि भाजपा को आत्ममुग्ध होने की गलती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि कांग्रेस को थोड़ा फायदा तो हुआ है। यह भी तब, जब प्रदेश कांग्रेस के अधिकांश बड़े नेताओं ने इन चुनावों से दूरी बनाई हुई थी और भाजपा संगठन के अलावा मुख्यमंत्री समेत एक दर्ज़न मंत्री भी चुनाव प्रचार में लगे हुए थे।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ ने भी अपने गढ़ में अधिकांश सीटें जीतकर यह साबित कर दिया कि उनका जलवा छिंदवाडा में बरकरार है। वैसे भी जीतने वाले 15 अध्यक्षों में से 7 कमलनाथ के ही समर्थक माने जाते हैं। इधर, जनसंपर्क मंत्री नरोत्तम मिश्रा के विधानसभा क्षेत्र डबरा से भाजपा की आरती मौर्य की जीत के भी राजनीतिक मायने हैं। कांग्रेस सांसद कांतिलाल भूरिया के क्षेत्र से भी कुछ परिणाम चौंकाने वाले हैं। जहां तक भाजपा का सवाल है तो उसे सबसे बड़ा झटका महाकोशल क्षेत्र से लगा है। यहां के 23 नगरीय निकायों में से पार्टी को 12 स्थानों पर ही जीत हासिल कर पाई। हाल ही में राज्यसभा में मंडला से भेजी गई संपतिया उइके के क्षेत्र से भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। वहीं सारनी से निर्दलीय उम्मीदवार का जीतना भी आश्चर्यजनक है। महाकोशल में हार का कारण टिकट वितरण माना जा रहा। भाजपा के संगठन मंहामंत्री सुहास भगत और उनकी टीम के लिए भी नतीजे चौंकाने वाले रहे होंगे।
पिछले 13 वर्षों से सत्ता पर काबिज भाजपा को अपने ही कार्यकर्ताओं का बगावती होना भी कई जगह भारी पड़ा। जाहिर है संगठन इस बारे में गंभीर मंथन करेगा, क्योंकि अगले वर्ष विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट नहीं मिलने के चलते बगावत और तेज होने के संकेत हैं। बताया जा रहा है कि करीब आधा दर्जन ऐसे स्थानीय निकाय हैं, जहां भाजपा की चुनावी नैया उसके अपनों के चलते डूबी है। शायद यही वजह है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के रोड शो के बावजूद भाजपा को रतलाम जिले के सैलाना में हार का सामना करना पड़ा है। यहां कांग्रेस प्रत्याशी नम्रता राठौर ने महत 144 वोट से जीत हासिल की है। उनकी जीत में भाजपा किसान मोर्चा जिला उपाध्यक्ष बाबूलाल पाटीदार की पत्नी शिवकन्या पाटीदार की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि वे निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ी थीं। इसी तरह मंडला से जिला उपाध्यक्ष अर्चना जैन के बागी होने की वजह से भाजपा को हार का सामना करना पड़ा।
मंदसौर जिले में किसान आंदोलन के बाद हुए इस चुनाव में भाजपा को झटका लगा है। शामगढ़ और गरोठ में भाजपा की परिषद होने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवारों की जीत को किसान आंदोलन से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि झाबुआ के पेटलावद से भाजपा को विजय प्राप्त हुई है। बैतूल में नगरीय निकाय चुनाव में तीन में से दो निकायों पर भाजपा जीती, लेकिन सारनी नगर पालिका में निर्दलीय प्रत्याशी ने बड़ा उलटफेर करते हुए यह सीट जीत कर चौका दिया है। यहां 10 साल से बीजेपी काबिज थी। माना जा रहा है कि सारनी में सतपुड़ा पावर हाउस की बंद होती यूनिटों और बढ़ती बेरोजगारी के कारण भाजपा को यह सीट गवानी पड़ी।
नंद कुमार ने फिर दी अरुण यादव को पटखनी
खरगोन जिले के भीकनगांव के नगर परिषद के चुनाव में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिह चौहान और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई थी। कांग्रेस और भाजपा में सीधी टक्कर के चलते दोनों दलों ने अपनी पूरी शक्ति प्रचार में झोंकी। यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के संसदीय क्षेत्र मे आता है। कांग्रेस अध्यक्ष अरूण यादव का भी यही क्षेत्र होने के कारण कांग्रेस ने पीसीसी अध्यक्ष अरूण यादव के नाम पर वोट मांगे थे। इसी तरह नेपानगर नगरीय निकाय भी भाजपा ने जीती है।

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