भारत की आंखों से दुनिया देखेगी ब्रह्मांड

tatpar 2 Augest 2013

बेंगलुरु।। जब टी. हरि ने 1.2 अरब डॉलर के थर्टी मीटर टेलीस्कोप (टीएमटी) के बारे में सुना, तो उन्हें इसमें बिजनेस की भरपूर संभावनाएं दिखीं। मुरली पांडिचेरी की कंपनी जनरल ऑप्टिक्स एशिया लिमिटेड (गोल) को हेड करते हैं। यह स्पेस और डिफेंस सेक्टर के लिए खास कंपोनेंट बनाती है। हालांकि, इसके लिए कॉन्ट्रैक्ट प्रॉजेक्ट में पार्टनर देश की कंपनियों को दिया जा रहा था। ऐसे में हरि कुछ नहीं कर सकते थे। पिछले हफ्ते उनकी यह दिक्कत दूर हो गई, जब इंडिया इस प्रॉजेक्ट में 10 फीसदी यानी 1,000 करोड़ रुपए का पार्टनर बना। अब तीन भारतीय कंपनियां- गोल, बेंगलुरु की अवसराला और गोदरेज ऐंड बॉयस टेलीस्कोप के लिए 700 करोड़ के कंपोनेंट बनाएंगी। यह जानकारी सरकारी अधिकारियों ने दी है।

ये कंपनियां हवाई में लगने वाले टेलीस्कोप के लिए जरूरी कंपोनेंट बनाएंगी। एस्ट्रोनॉमी के क्षेत्र में यह अब तक के अहम प्रॉजेक्ट्स में से एक माना जा रहा है। इस टेलीस्कोप के लिए ऐसी टेक्नॉलजी का इस्तेमाल होगा, जो अभी हैं ही नहीं। मुरली ने कहा, ‘इससे ऐसी टेक्नॉलजी डिवेलप करने में मदद मिलेगी, जो दुनिया के कुछ देशों के पास होगी।’ इस प्रॉजेक्ट में अमेरिका, जापान, चीन और कनाडा भी पार्टनर हैं। अब तक जितने बड़े टेलीस्कोप बने हैं, टीएमटी उनसे तीन गुना बड़ा होगा। यह सबसे महंगा भी होगा। इस तरह के कई टेलीस्कोप दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लगाने की योजना बन रही है। यह वैसे ऑब्जेक्ट्स की भी तस्वीर ले सकेगा, जो अभी संभव नहीं है।

दूसरे स्टार के प्लैनेट की इमेज भी कैप्चर कर सकेगा। इससे यूनिवर्स के बारे में हमारी समझ बेहतर होगी। भारत सरकार इस प्रॉजेक्ट में टीएमटी इंडिया नाम की एजेंसी के जरिए 1,000 करोड़ रुपए इन्वेस्ट करेगी। यह प्राइवेट कंपनियों को रुपए में पेमेंट करेगी। भारतीय कंपनियां जो कंपोनेंट बनाएंगी, उन्हें पहले अमेरिका के पासाडेना भेजा जाएगा। वहां से ये पार्ट्स हवाई भेजे जाएंगे, जहां टेलीस्कोप बनाया जा रहा है। 30 मीटर का टेलीस्कोप बनाना हंसी का खेल नहीं है। इसके लिए 30 मीटर के डायमीटर वाले सिंगल मिरर की जरूरत पड़ेगी। इसलिए पहले मिरर को कंपोनेंट में बांटा जाएगा।

इन्हें 492 पार्ट्स में बांटा जाएगा और बाद में असेंबल किया जाएगा। मिरर के हर पीस के पीछे सेंसर लगा होगा। इनमें से 100 पार्ट्स इंडिया बनाएगा। भारतीय कंपनियों को हर हफ्ते इसका एक पीस बनाना होगा। गोल के अलावा इंडिया में ऑप्टिक्स में महारत रखने वाली दूसरी कोई कंपनी नहीं है। यहां तक कि गोल ने भी ऐसे टेलीस्कोप पर कभी काम नहीं किया है। भारत में अब तक जो टेलीस्कोप बना है, उसका डायमीटर सिर्फ 2 मीटर है। इसलिए हमारे देश में सिर्फ फर्स्ट जेनरेशन के टेलीस्कोप हैं, जबकि दुनिया आज फोर्थ जेनरेशन के टेलीस्कोप का इस्तेमाल कर रही है। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स के असोसिएट प्रोफेसर ईश्वर रेड्डी ने कहा कि कुछ ही देशों के पास मिरर हैं। इस प्रॉजेक्ट से भारत ऑप्टिक्स में काफी आगे बढ़ सकता है।