मंत्रिमंडल विस्तार में सिंधिया और संगठन का प्रभाव

 

 

 

 

 

 

  • कई बड़े चेहरे नदारद,नए चेहरों को मिला मौका

शैलेन्द्र सिंह पंवार, इंदौर। 100 दिनी शिवराज सरकार के मंत्रिमंडल का गुरुवार को विस्तार हो ही गया, लेकिन चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। 24 विधानसभा उपचुनाव की चुनौती तीन माह बाद है, लेकिन मौजूदा चुनौती कई बड़े चेहरों को मंत्रिमंडल में स्थान नहीं देने से उपजी है। रामपाल सिंह, पारस जैन जैसे वरिष्ठ विधायकों को स्थान नहीं देने से सरकार और संगठन की सेहत पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा, लेकिन राजेन्द्र शुक्ल, अजय बिश्नोई, संजय पाठक, रमेश मेंदोला, गौरीशंकर बिसेन, हरिशंकर खटीक, केदारनाथ शुक्ल, गिरीश गौतम आदि ऐसे नाम है, जो आने वाले दिनों में सरकार और संगठन को मुश्किल में डालने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे। हालांकि ये ऐसा कोई निर्णय भी नहीं लेंगे, जिससे की सरकार के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगे, पर अपनी कार्यप्रणाली व बयानों से समय-समय पर एहसास कराते रहेंगे की उनको नजरअंदाज करके ठीक नहीं किया गया है। इनमे से कुछ आने वाले दिनों में उपचुनाव के साथ ही पंचायत व निकाय चुनाव में भी अपनी नजरअंदाजगी का अहसास कराने से नहीं चूकेंगे। वैसे मंत्रिमंडल के गठन से ये भी स्पष्ट हो गया है कि शिव को विष पीना ही पड़ा है, मुख्यमंत्री अपनी पसंद के कई चेहरों को स्थान नहीं दिला सके है। इनमें प्रमुख रूप से राजेन्द्र शुक्ल, अजय बिश्नोई, संजय पाठक, हरिशंकर खटीक शामिल है। मंत्रिमंडल में ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थकों को छोड़ दिया जाए तो सीधे तौर पर शिवराज के समर्थकों की संख्या 4-5 से अधिक नहीं है, इनमे भूपेन्द्र सिंह, विश्वास सारंग, विजय शाह, जगदीश देवड़ा आदि को गिना जा सकता है, शेष सभी मंत्री संगठन की पसंद से है या फिर इन्हें दूसरे बड़े नेताओं ने संरक्षण दिया है। जैसे पन्ना विधायक बृजेन्द्र प्रताप सिंह को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा की रूचि से मंत्रिमंडल में स्थान मिल सका है, जबकि उषा ठाकुर अंतिम समय पर प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे के कारण मंत्री बन गई। राजेन्द्र शुक्ल को रोकने के लिए विंध्य अंचल में केदारनाथ शुक्ल, गिरीश गौतम जैसे दूसरे ब्राहम्ण विधायक एकजुट हो गए थे, ये सब भी सीनियर है और शुक्ल के बढ़ते हुए कद से क्षेत्र में लगातार हाथिये पर जा रहे थे। ये सभी शुक्ल को रोकने में सफल भी रहे, पर इनमे से कोई भी मंत्रिमंडल में स्थान नहीं पा सका। ठीक इसी प्रकार इंदौर में रमेश मेंदोला का नाम तय हो गया था, शिवराज और संगठन की मंशा थी कि राजनीतिक तौर पर बेलेंस रखने के लिए शहर से एक और मंत्री बनाया जाना चाहिए, लेकिन इस पर सहमति नहीं बन सकी। तब उषा ठाकुर को मौका दे दिया गया, हालांकि वे पहले से ही दौड़ में थी, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र से विधायक होने के कारण कुछ दिक्कतें भी थी, क्योंकि ग्रामीण से पहले ही तुलसी सिलावट मंत्री है। कुल मिलाकर मुख्यमंत्री भले ही शिवराज सिंह चौहान है, लेकिन मंत्रिमंडल के गठन में सिंधिया के बाद प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुध्दे, प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा व संगठन महामंत्री सुहास भगत का प्रभाव दिखाई दिया है, इसमें इन्हें केंद्रीय नेतृत्व का भी पुरा संरक्षण मिला है। भाजपा नेता भले ही मंत्रिमंडल के गठन में क्षेत्रीय, जातिगत व अनुभव के संतुलन की बात कहे, पर सिंधिया समर्थकों की मौजूदगी से ये शत प्रतिशत नहीं दिखाई देता है।

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