मोदी की नियुक्ति से नाराज आडवाणी ने दिया इस्‍तीफा

tatpar 10 june 13
नई दिल्‍ली। गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के वरिष्‍ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की तल्‍खी कम होने का नाम नहीं ले रही है। मोदी को बीजेपी चुनाव अभियान समिति का अध्‍यक्ष बनाए जाने के अगले दिन ही आडवाणी ने बीजेपी राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी, चुनाव समिति और संसदीय बोर्ड से इस्‍तीफा दे दिया है। आडवाणी ने इन पदों से इस्‍तीफा देते हुए पार्टी अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह के नाम चिट्ठी भी लिखी है। इस चिट्ठी में आडवाणी की नाराजगी जाहिर हो रही है।  आडवाणी ने कहा है कि पार्टी में व्‍यक्ति विशेष का महत्‍व बढ़ता जा रहा है जो पार्टी के उसूलों के खिलाफ है।
राजनाथ सिंह आज आडवाणी को मनाने उनके घर भी गए थे। लेकिन आडवाणी की नाराजगी कम नहीं हुई। आडवाणी ने पार्टी के पद छोड़े हैं, पार्टी नहीं। आडवाणी एनडीए के चेयरमैन बने हुए हैं।
एक ओर मोदी और आडवाणी के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं तो आडवाणी को अपना गुरु बता चुके मोदी अब भी उन्‍हें आदरणीय बता रहे हैं। मोदी ने एक बार इंटरव्यू में कहा था कि जब वह राजनीति में नहीं थे तो आडवाणी के इंटरव्‍यू से उन्‍हें काफी प्रेरणा मिलती थी। आडवाणी के विचार पढ़ कर उनके विचार को धार मिलती थी। मोदी ने स्‍वीकार किया था कि आडवाणी के विचारों का उनकी  विचारधारा में अहम योगदान रहा है। लेकिन बीजेपी चुनाव प्रचार समिति का अध्‍यक्ष बनाए जाने पर मोदी ने एक बार भी आडवाणी का नाम नहीं लिया।
मोदी और आडवाणी में ‘फूट’ की शुरुआत साल 2005 में उस वक्‍त हुई, जब जिन्‍ना प्रकरण में अलग-थलग पड़ गए आडवाणी की उनके ‘शिष्‍य’ मोदी ने ही मदद नहीं की। आडवाणी ने जिन्‍ना को धर्मनिरपेक्ष और हिंदू व मुस्लिम एकता का प्रतीक बताया था। ताबूत में आखिरी कील 17 सितंबर 2011 को उस वक्‍त लगा, जब मोदी ने अपना तीन दिन का सद्भावना व्रत शुरू किया। प्रधानमंत्री की कुर्सी की चाह में मोदी ने मुसलमानों से गले मिलने में भी संकोच नहीं किया। उसी साल दो अक्‍टूबर को आडवाणी पोरबंदर से भ्रष्‍टाचार विरोधी यात्रा शुरू करने जा रहे थे लेकिन मोदी की इस हरकत के कारण आडवाणी ने नीतीश कुमार के बिहार से यात्रा शुरू की। यात्रा का स्‍थल था जयप्रकाश नारायण की जन्‍म स्‍थली सिताब दीयारा।
आडवाणी और मोदी की पहली मुलाकात वर्ष 1975 में आपातकाल के दौरान हुई थी। उस वक्‍त मोदी एक मामूली कार्यकर्ता थे और आडवाणी जनसंघ के दिग्‍गज नेता। उस दौरान आडवाणी ने मोदी की संगठनात्‍मक शक्ति को पहचानते हुए आगे लाने की कोशिश शुरू की। दिन गुजरते गए और मोदी-आडवाणी करीब आते गए। 1987 में मोदी ने पहली बार अहमदाबाद के नगर निकाय चुनाव में जीत हासिल की। बस वहीं से मोदी के कदम ऐसे बढ़े कि
उन्‍होंने कभी पीछे मुड़ कर देखा तक नहीं।
वर्ष 1991 में मोदी ने आडवाणी को गांधीनगर से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए राजी कर लिया। इस तीर से मोदी ने दो निशाने साधे। पहला निशाना पार्टी के भीतर अपने विरोधी शंकर सिंह वाघेला से उनका संसदीय क्षेत्र गांधीनगर छीन लिया और गुजरात में अपना कद बढ़वा लिया। जिसके बाद वाघेला हमेशा के लिए साइड लाइन हो गए और मोदी आडवाणी के और अधिक करीब आ गए।
उसी दौर में मोदी ने आडवाणी को सोमनाथ से अयोध्‍या तक राम यात्रा के लिए राजी किया। इससे गुजरात में भाजपा और अधिक मजबूत हुई और इसके बाद के चुनाव में बीजेपी भारी बहुमत से विजयी हुई। इसके बाद मोदी को पार्टी का महासचिव बना दिया गया। यह मोदी के लिए बड़ी जीत थी।
कहने को तो गुजरात में उस दौरान केशुभाई  पटेल की सरकार थी लेकिन कुर्सी के पीछे पूरी ताकत मोदी की ही लगी थी। मोदी को उस वक्‍त सुपर सीएम कहा जाता था। मोदी की कई शिकायतों के बाद आखिरकार खजुराहो बैठक में शंकर सिंह वाघेला ने बगावत कर बाहर का रास्‍ता अपना लिया। नतीजा केशुभाई की सरकार गिर गई। यह घटना 1996 की है।
मोदी के खिलाफ माहौल इतना अधिक बढ़ गया था कि पार्टी आलाकमान ने मोदी को गुजरात के बाहर असम भेजने का फैसला कर लिया था लेकिन आडवाणी के कारण मोदी को असम की जगह पंजाब-हरियाणा-हिमाचल प्रदेश की जिम्‍मेदारी दी  गई।
1998 के चुनाव के बाद केशुभाई फिर से सत्‍ता में आए। लेकिन सूखे, कांडना का तूफान और कच्‍छ में आए भूकंप ने उनकी सत्‍ता की चूलें हिला दीं। केशुभाई की लीडरशीप के बावजूद भाजपा कई उपचुनाव हार गई। इसके बाद अक्‍टूबर 2001 में आडवाणी ने अपने शिष्‍य मोदी को गुजरात का मुख्‍यमंत्री बना दिया। मोदी बिना चुनाव लड़े मुख्‍यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो चुके थे।
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