मौत के मातम के बीच जिंदगी की तलाश…

उत्तराखंड में सैलाब का कहर तो गुज़र गया, लेकिन कहर के बाद की टीस लोगों की जीने नहीं दे रही है. कभी अपने ख़ूबसूरत नज़ारों और तीर्थयात्राओं के लिए मशहूर इस सूबे में अब कुछ बचा है, तो वह है मौत, मलबा और मातम…सिसकते उत्तराखंड की तस्वीरें, आपको चौंका देंगी.

देवभूमि उत्तराखंड की भयानक तस्वीर देखने भर से रोंगटे खड़े हो जाते हैं, जिस्म में सिहरन पैदा हो जाती है. इसे देखकर यहां आए कुदरती कहर का गुमान तो होता है, लेकिन कोई चाहकर भी उस तबाही का सही-सही तसव्वुर नहीं कर सकता, क्योंकि आप जितना भी सोचते हैं, यह तबाही कहीं उससे भी ज़्यादा बढ़कर है.

रामबाड़ा
रामबाड़ा वह जगह है, जहां से गुज़रे बगैर श्रद्धालुओं की चार धाम की यात्रा पूरी ही नहीं हो सकती. लेकिन 16 जून की रात इसी रामबाड़े में बादल फटने के बाद जो कुछ हुआ, उसे अल्फ़ाज़ में बयान करना भी नामुमकिन है. केदरनाथ धाम से करीब 7 किलोमीटर पहले इस कस्बे में करीब 90 गेस्ट हाउस, मकान और दुकान हुआ करते थे. लेकिन यहां अब कुछ बचा है, तो वह है सिर्फ़ मलबा और हर तरफ़ पड़ी लाशें.

कुदरत के इस कहर के बाद रामबाड़ा की जो पहली तस्वीर सामने आई, उसे देखना भी मुश्किल है. क्या इंसान और क्या जानवर, मौत के सैलाब ने सबको अपनी आगोश में लेकर जगह-जगह कुछ ऐसा बिखेरा है कि ज़िंदगी का नामो-निशान मिट गया है. रेत-पत्थर और मलबे के साथ-साथ हर तरफ़ बिखरे सामान इस बात की गवाही देते हैं कि कभी यहां भी एक खुशहाल दुनिया आबाद हुआ करती थी. लेकिन अचानक सैलाब ने किसी को संभलने का मौका ही नहीं दिया. कहीं कपड़े, कहीं चप्पल, तो कहीं दूध की कटोरी…

तिलवाड़ा
उत्तराखंड में रुद्रप्रयाग के नज़दीक बसे इस कस्बे के पास अपनी बर्बादी की अलग ही कहानी है. मंदाकिनी नदी में आई बाढ़ ने रातों-रात तिलवाड़ा को कुछ ऐसे उजाड़ा कि यहां तरफ़ तबाही फैली है. क्या स्कूल, क्या मकान और क्या दुकान, सैलाब और पहाड़ों से आए पत्थरों ने सबकुछ जैसे छिन्न-भिन्न कर दिया है. कितने लोग ग़ायब हुए हैं और कितनों की मौत हुई है, ये अब तक खुद तिलवाड़ा के बाशिंदों तक को सही-सही पता नहीं है.

मंदाकिनी नदी के किनारे बना एक पेट्रोल पंप मिट्टी की कटाई के चलते अब हवा में झूल रहा है. वहीं गांव का हाई स्कूल खंडहर में तब्दील हो गया है. मजबूरी में अब स्कूल को दूसरी जगह शिफ्ट करना पड़ा है. घरों की हालत ऐसी है कि उसे बयान करना भी मुश्किल है. लेकिन सबसे बुरी हालत है यहां ज़िंदा बचे उन लोगों की, जिनके लिए अब ज़िंदा रहना भी एक चुनौती बन गया है. सवाल वही है कि तमाम बर्बादी के बावजूद लोग आख़िर अपनी मिट्टी, अपने खेत और अपना घर-बार छोड़कर आख़िर जाएं भी तो कहां जाएं?

श्रीनगर
उत्तराखंड का यह कस्बा अब अचानक ज़मीन से कई फीट नीचे चला गया है. यूं कहें कि कस्बे में सैलाब के साथ आए मलबे या मिट्टी ने जगह कुछ ऐसी घेरी है कि यहां बने तमाम मकान-दुकान और दूसरी चीज़ें अब कई फीट नीचे दब गई हैं.

श्रीनगर में बने एसएसबी यानी सीमा सुरक्षा बल का ट्रेनिंग कैंप भी इस हादसे का बुरी तरह शिकार हुआ है. एक इमारत की छत पर लगा सोलर सिस्टम पूरी तरह कीचड़ में दब चुका है.

उत्तरकाशी
उत्तराखंड के श्रीनगर से दूर उत्तरकाशी का नजारा भी कुछ वैसा ही है. ये दोनों जगह एक-दूसरे से तकरीबन 132 किलोमीटर दूर होने के बावजूद तबाही की मार दोनों ही ठिकानों पर तकरीबन एक सी है. रास्ते धुल गए हैं, बस्तियों और आबादी का नामोनिशान मिट गया है. उत्तरकाशी के मोहल्ले में सैलाब का असर कैसा था, यह समझने के लिए यहां के मकानों और गाड़ियों को देखा जा सकता है. कुछ लोग अब यहां बैठकर हाथों से अपनी गाड़ियों में भरी मिट्टी को निकालने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन इस तरह यह काम वो कब तक पूरा कर पाएंगे, ये कोई नहीं जानता. सच तो यह है कि उत्तरकाशी का यह पूरा का पूरा शहर ही मलबे के ढेर में समा चुका है.

गोविंदघाट
तकरीबन यही हालत गोविंदघाट इलाके की है. यहां भी मकान, दुकान, गुरुद्वारा, होटल सबकुछ बर्बाद हो चुका है. गोविंदघाट गुरुद्वारे की तस्वीरों को देखकर समझा जा सकता है कि यहां सैलाब का असर कैसा रहा होगा. बाढ़ के वक्त जो जब जिस हाल में रहा, उसे जान बचाने के लिए उसी हाल में भागना पड़ा. जो नहीं भाग सके, वो आसमान से उतरी मौत का शिकार बन गए. गुरुद्वारे के आस-पास बिखरे लोगों के सामान, जूते-चप्पल, प्रसाद और किताबें बता रही हैं कि इस जगह अलकनंदा नदी ने अपना गुस्सा किस कदर उतारा.

सीतापुर गांव
चंपावत तहसील का यह गांव सैलाब की सबसे ज़्यादा मार झेलनेवाले इलाकों में से एक है. गांव में सड़कों की जगह बड़े-बड़े पत्थरों की ढेर ने जगह ले ली है. मकान टूटकर बिखर चुके हैं. जो बचे हैं, वो भी रहने लायक नहीं हैं. कहीं सामान बिखरे पड़े हैं, कहीं मिट्टी के नीचे कार दबी है, तो कहीं किसी श्रद्धालु के हाथ में रही गंगाजल की बोतल यूं ही पड़ी है. इन चीजों के मालिक कौन हैं, कोई नहीं जानता. हालत ऐसी कि देखकर खुद पत्थर का दिल भी पसीज जाए, फिर इंसान भला अपने आंसुओं को कैसे रोक सकता है?

उदरी गांव
सीतापुर की तरह ही उदरी गांव भी अपनी किस्मत की बदहाली पर आठ-आठ आंसू रो रहा है. पूरा गांव तबाह हो चुका है और लोगों के लिए रहने की जगह नहीं बची है.

बिरही
ठीक इसी तरह बिरही में भी नदी की धार ने अपने रास्ते में आई तमाम चीज़ों को कुछ ऐसे उखाड़ फेंका है, जैसे कोई तूफ़ान अपने रास्ते में आई चीज़ों को उड़ा ले जाता है. कभी यहां गढ़वाल मंडल का एक होटल हुआ करता था. लेकिन अब यहां एक टूटी दीवार के सिवा और कुछ भी नहीं. लेकिन यह उत्तराखंड की तबाही का अंत नहीं है, बल्कि तबाही और बर्बादी की कहानियां अभी और भी हैं.

एक इंच दूर खड़ी मौत कैसी होती है? यह जानने के लिए उत्तराखंड में एक नहीं, सैकड़ों किस्से मौजूद हैं. लेकिन इन तमाम किस्सों के बावजूद इस पहाड़ी सूबे में ज़िंदगी एक बार फिर से करवट ले रही है. कहीं नक्शों से गायब रास्ते फिर से उकेरे जा रहे हैं, तो कहीं आशियानों के टूटे तिनके जोड़े जा रहे हैं.

गंगोत्री
गंगोत्री के पास पेश आए मंज़र का तसव्वुर करने के लिए एक टैक्सी को देखना ही काफ़ी है. लेकिन खुशकिस्मती से इस बदकिस्मत गाड़ी पर पत्थर उसके पिछले हिस्से पर नहीं, बल्कि बॉनट पर गिरा, जिससे गाड़ी तो ख़ैर तबाह हो गई, लेकिन इस गाड़ी में सवार सभी के सभी लोग बाल-बाल बच गए. कहते हैं ना, ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम है, इसीलिए इन तमाम दुश्वारियों के बावजूद उत्तराखंड में लोग फिर से अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं.

जोशीमठ
कहीं फिर से पहाड़ों का सीना चीर कर रास्ते बनाए जा रहे हैं, तो कहीं नदी की धारों के बीच नई उम्र के लोग क्रिकेट में ज़िंदगी की उम्मीद तलाश रहे हैं. दुआ कीजिए कि इंसानों की यह कोशिश फिर से रंग लाए और उत्तराखंड फिर से खड़ा हो जाए.