लोकतंत्र में भीड़तंत्र की इजाज़त नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने आज मॉब लिंचिंग को एक अलग अपराध की श्रेणी में रखने की बात है और सरकार से कहा है कि इसकी रोक थाम के लिए वो एक नया क़ानून बनाए.

मॉब लिंचिंग और गोरक्षकों द्वारा हिंसा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई नागरिक अपने हाथ में क़ानून नहीं ले सकता. ये राज्य सरकारों का कर्तव्य है कि वो क़ानून व्यस्था बनाए रखें.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘कोई भी नागरिक अपने आप में क़ानून नहीं बन सकता है. लोकतंत्र में भीड़तंत्र की इजाज़त नहीं दी जा सकती.’ सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को सख्त आदेश दिया कि वो संविधान के मुताबिक काम करें.

तीन न्यायाधीश वालों खंडपीठ के नेतृत्व में भारत के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा, “भय और अराजकता के मामले में, राज्य को सकारात्मक कार्य करना पड़ता है. हिंसा की अनुमति नहीं दी जा सकती है.” अदालत ने कहा, “लोकतंत्र के भयानक कृत्यों को एक नया मानदंड बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है और इसे सख्ती से दबाया जाना चाहिए.”

सुप्रीम अदालत के आदेश सामाजिक कार्यकर्ता तहसीन पूनावाला और महात्मा गांधी के परपोते तुषार गांधी द्वारा गोरक्षकों की हिंसा पर जांच करने की मांग की याचिका पर सुनवाई के दौरान आए हैं.

तुषार गांधी ने कुछ राज्यों पर एक अवमानना याचिका भी दायर की थी, जिसमें आरोप लगाया था कि वो अदालत के पहले आदेशों को लागू नहीं कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 28 अगस्त को और सुनवाई के लिए याचिकाएं पोस्ट की हैं.

भारत में पिछले कुछ सालों में मॉब लिंचिंग और गोरक्षकों द्वारा हिंसा की कई घटनाएं घटी हैं जिनके दौरान भीड़ लोगों को पीट-पीट कर मार देती है.

कर्नाटक में सबसे ताज़ा घटना

सबसे ताज़ा घटना कर्नाटक में घटी जिसमें बच्चा चोरी के शक़ में एक भीड़ ने एक कार में सवार चार लोगों की जम कर पिटाई की. हिंसा में एक इंजीनियर की मौत हो गयी. बच्चा चोरी की अफ़वाह एक व्हाट्सऐप ग्रुप ने फैलाई थी.

पुलिस के मुताबिक संदेश भेजने वाले मनोज पाटिल कई व्हाट्सऐप ग्रुप चलाते हैं. अभी तक की जांच में पुलिस ने पाया है कि कार में जा रहे चार लोगों पर हमले की वजह यह व्हाट्सऐप संदेश ही बना.

पुलिस का कहना है कि व्हाट्सऐप पर संदेश वायरल होने के बाद लोगों ने कार का पीछा किया और फिर उसमें सवार चार लोगों पर हमला कर दिया जिनमें से एक की मौत हो गई. मारे गए 32 वर्षीय मोहम्मद आज़म हैदराबाद के मलकपेट के रहने वाले थे और वो गूगल के एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे.

केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा लिंचिंग अभियुक्तों के साथ?

पिछले साल 29 जून को झारखण्ड के रामगढ़ शहर में अलीमुद्दीन अंसारी नामी एक व्यक्ति को एक भीड़ ने भरे बाज़ार में पीट-पीटकर मार डाला था. इस मामले के लिए बनाई गई फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 11 अभियुक्तों को दोषी मानकर उन्हें उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई थी जिनमें स्थानीय बीजेपी नेता नित्यानंद महतो भी शामिल थे.

लेकिन जब ये मामला रांची हाईकोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट ने इन लोगों की सज़ा पर स्टे लगाकर उन्हें ज़मानत पर रिहा कर दिया.

बताया जा रहा है कि शुक्रवार को जब ये लोग जेल से छूटे तो केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने कथित तौर पर माला पहनाकर उनका स्वागत किया.

हिंसा की शुरुआत अख़लाक़ अहमद की हत्या से

साल 2015 में ग्रेटर नोएडा से लगे दादरी इलाक़े में बीफ़ खाने के संदेह में एक बड़ी और उत्तेजित भीड़ ने अख़लाक़ अहमद की पीट-पीट कर हत्या कर दी थी.

इस हमले ने देश को झिंझोड़ कर रख दिया था. इसके बाद हुई घटनों में भी भीड़ ने अधिकतर मुसलमानों को निशाना बनाया जिन में राजस्थान में पहलु ख़ान और हरियाणा में हाफ़िज़ जुनैद नामी एक नौजवान की हत्याएं हुईं और मुस्लिम समुदाय में डर का माहौल बना.

अख़लाक़ अहमद का परिवार

लेकिन बाद की कई घटनाएँ व्हाट्सऐप में अफ़वाहें फैलने के कारण हुईं जिन में भीड़ ने अक्सर बच्चा चोरी के इलज़ाम में अनजान लोगों की पीट कर हत्या कर दी.

लिचिंग की कुछ घटनाएं

त्रिपुरा में बच्चे उठाने के शक में तीन लोगों को भीड़ ने मार दिया. एक झूठे सोशल मीडिया मैसेज के चलते क्रिकेट बैट और लातों से मार-मार कर बेरहमी से उनकी जान ले ली गई.

एक व्हाट्सऐप मैसेज ने तमिलनाडु में हिंदी बोलने वाले की हत्या करने के लिए भीड़ को एकजुट कर दिया.

अगरतला में बच्चे उठाने की अफ़वाह में दो लोगों को मार दिया गया. विशेषज्ञ कहते हैं की इस सबके पीछे सोशल मीडिया ज़िम्मेदार है.

विशेषज्ञों के अनुसार अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद केंद्र और राज्य सरकारों पर इन घटनाओं को रोकने का दबाव ज़रूर बनेगा.

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