शांति भूषण का दावा-आडवाणी चाहते थे कायम रहे इमरजेंसी लगाने की ताकत

नई दिल्ली. 1975 में लगी इमरजेंसी को 40 साल पूरे हो गए हैं। इमरजेंसी लगाने वाली पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ मुकदमा लड़ने और जीतने वाले वकील शांति भूषण
ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा है कि बीजेपी के सीनियर लीडर लालकृष्ण आडवाणी ने संविधान के 44वें संशोधन का विरोध किया था। शांति भूषण ने दावा किया कि आडवाणी चाहते थे कि सरकार के पास आपाताल लगाने की ताकत मौजूद रहे। शांति भूषण का बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि आडवाणी इमरजेंसी के खिलाफ खुलकर बोलते रहे हैं। पिछले दिनों आडवाणी ने आशंका जताई थी कि देश में फिर से आपातकाल लग सकता है।
इमरजेंसी और राजनीतिक से जुड़े सवालों को लेकर दैनिक भास्कर से रू-ब-रू हुए पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील शांति भूषण से। पेश है बातचीत के मुख्य अंशः
सवाल- 40 साल पहले 25 जून 1975 को कांग्रेस की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोपा था। अब आप जब मुड़कर देखते हैं तो लोकतंत्र को किस मायने में मजबूत और किस मायने में कमजोर पाते हैं?
जवाब- उस समय संविधान में ही प्रावधान था कि सरकार अपनी जरूरत के अनुसार जनाधिकारों को छीन सकती है इसलिए इंदिरा ने इतनी आसानी से मुल्क को तानाशाही के शासन में धकेल दिया। अब ऐसा नहीं है। 1977 में मैं जब कानून मंत्री बना तो 44वां संविधान संशोधन हुुआ। संशोधन में दर्ज हुआ कि आपातकाल लगाए जाने के बावजूद भी संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 को खत्म नहीं किया जाएगा, जबकि 1975 में इंदिरा ने इन्हीं दोनों अनुुच्छेदों को हमसे ले लिया। अनुच्छेद 19 में दो बेहद महत्वपूर्ण अधिकार हैं। पहला, अभिव्यक्ति का अधिकार जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है और दूसरा है बिना हथियार शांतिपूर्वक एकत्रित होकर विरोध करने का अधिकार। वहीं अनुच्छेद 21 के तहत प्रावधान है कि अगर किसी को गलत तरीके से गिरफ्तार किया जाए तो वह अदालत में ‘हैबियस काॅरपस याचिका’ दाखिल कर अदालत से रिहाई की अपील कर सकता है। साफ है कि अब कोई सरकार आपातकाल लगाकर जनता के बुनियादी अधिकारों पर ताला नहीं जड़ सकती ।
सवाल- 1975 के बाद क्या कभी ऐसा हुआ जब आपको लगा हो कि अगर 44वां संविधान संशोधन नहीं हुआ होता देश में आपातकाल लग सकता था?
जवाब- साल 2011 में अन्ना आंदोलन से खौफजदा कांग्रेस सरकार दोबारा देश पर आपातकाल लाद सकती थी। एक हफ्ते के भीतर जिस तरह देश में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन फैला उससे सरकार आपातकाल के बाद पहली बार घबराई थी। जनता से लेकर मीडिया तक कोई उनके साथ नहीं था, कांग्रेस पार्टी के नेताओं का आत्मविश्वास लगातार डांवाडोल हो रहा था। वे इतने घबराए कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की ज्वाइंट ड्राफ्टिंग कमेटी की मांग तक को मान गए जिसके बारे में उनका कहना था कि यह गैर संवैधानिक है। पर 44वें संशोधन के बाद अब सरकार के पास ऐसा कोई अधिकार ही नहीं है कि वह अभिव्यक्ति, प्रेस की आजादी और अदालत जाने के अधिकार को छिन सके।
सवाल- तो क्या देश में अब आपातकाल असंभव है?
जवाब- बेशक, देश में आपातकाल असंभव है। यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी भी बहुमत के सरकार के बूते आपातकाल दोहराना चाहें तो वह एक दिवास्वप्न ही साबित होगा। लोगों की लोकतांत्रिक चेतना, मीडिया और संचार माध्यमों की पकड़ देश में विद्रोह करा देगी पर आपातकाल को नहीं सह पाएगी।
सवाल- पर आप लोगों ने संविधान संशोधन के दौरान आपातकाल का प्रावधान ही क्यों नहीं खत्म कर दिया?
जवाब- आपातकाल से सरकार को कुछ अधिकार मिलते हैं। अगर कोई सरकार आपातकाल लगाकर लोकतंत्र को खत्म नहीं कर पाती और वह आपातकाल देश के मुश्किल वक्त की जरूरत है, फिर इसमें मुझे कोई बुराई नहीं जान पड़ती। उसपर ज्यादा हायतौबा नहीं मचाया जाना चाहिए। कई बार आपातकाल देश के लिए जरूरी भी हो सकता है, रेयर आॅफ द रेयरेस्ट मामलों में, खासकर युद्ध की स्थितियों में।
सवाल- फिर आडवाणी की आशंका ‘दुबारा भी लगाया जा सकता है आपातकाल’ का क्या आधार है?
जवाब- नेता दो तरह के होते हैं। एक वो जो सिर्फ अपना और अपनी पार्टी का फायदा देखते हैं, दूसरे वो जिन्हें स्टेट्समैन कहते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी स्टेट्समैन थे जबकि लालकृष्ण आडवाणी अपना भला चाहने वालों में हैं। जनता पार्टी की सरकार में जब वो मेरे साथ कैबिनेट मंत्री थे तब भी उन्होंने 42 वें संशोधन का विरोध किया। वकील राम जेठमलानी और आडवाणी जी का कहना था कि 42वें संशोधन का हू-ब-हू लागू किया जाए अन्यथा उसे पूरे तौर पर खत्म कर दिया जाए। मेरा कहना था जो उसकी अच्छी चीजें हैं उसे लेने में हर्ज क्या है? कैबिनेट ने उनके सुझाव को तवज्जो नहीं दी थी। अब 40 साल बाद उन्हें आपातकाल का डर सता रहा है। मुझे लगता है कि आडवाणी जी ने संविधान का 44वां संशोधन पढ़ा ही नहीं, अन्यथा ऐसा नहीं कहते। मेरा विनम्र सुझाव है कि एक बार वह संशोधन को ध्यान से पढ़ लें, जवाब उन्हें स्वत: मिल जाएगा।
सवाल- कई नेता, राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं, लिख रहे हैं कि देश में अघोषित आपातकाल जैसी स्थितियां हैं?
जवाब- देखिए,सरकारों के काम करने के दो तरीके हैं। पहला लोकतांत्रिक होकर, सबको शामिल कर और दूसरा है अकेले के फैसले को ही नियम बताकर। लोकतांत्रिक तरीके में विकास की गति थोड़ी धीमी रहती है लेकिन समाज के सभी वर्गों का ख्याल रखा जाता है। वहीं अकेले की शासन प्रणाली में व्यक्ति ही कानून और अध्यादेश हो जाता है। हालांकि, विकास की गति तेज होती है। मोदी सरकार भी फिलहाल एकल नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ रही है। अपने ही मंत्रियों-नेताओं के पर कतर रही है, मगर इसे अघोषित आपातकाल कहने की बजाए प्रैक्टिस कह सकते हैं। जैसे-जैसे लोगों का मन पकता जाएगा मोदी के तेवर भी बिखरते जाएंगे।
सवाल- आपको इंदिरा गांधी के खिलाफ पैरवी के लिए खड़े होने का मौका कैसे मिला?
जवाब- 1971 के लोकसभा चुनाव के दौरान मैं उत्तर प्रदेश का एडवोकेट जनरल था। तभी मुझसे राजनारायण मिले। उन्होंने याचिका में मुख्य मुद्दा ‘केमीकली टिंटेड बैलेट पेपर’ का उठाया था। उनका कहना था कि इंदिरा ने बैलेट पर रूस से मंगाए केमीकल का इस्तेमाल किया है। इस संदर्भ में उन्होंने लखनऊ के एक-दो वैज्ञानिकों से मेरी मुलाकात कराई। वैज्ञानिकों ने अल्ट्रा वाॅयलेट किरणों के जरिए कुछ दिखाया पर मैंने कहा, इससे कुछ नहीं होना है। फिर मैंने कुछ आधार बनाए। चुनावी सभाओं-प्रचारों में सरकारी धन का दुरुपयोग, एयरफोर्स के हेलिकाॅप्टरों से इंदिरा का चुनावी दौरा, अदालत में मुद्दा बना जिसके आधार पर 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1971 के चुनाव को अवैध और अमान्य करार दिया।
सवाल- तो क्या इंदिरा गांधी गलत तरीके से जीती थीं?
जवाब- सरकारी धन का इस्तेमाल किया था पर जीत की वजह कुछ और थी। इंदिरा ने कहा, ‘ये लोग कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ।’ और दूसरा उन्होंने निजी बैंको का सरकारीकरण कर दिया। ये दोनों आपस में जुड़ गए। इंदिरा के प्रचार तंत्र से गरीबों ने पूछा कैसे हटेगी गरीबी, उनका जवाब था इसलिए तो निजी बैंकों को सरकारी किया है। गरीबों को लगा अब बैंक सरकारी हो गए, जो रुपए पहले एक आदमी के थे वो सबके हो गए। इसकी तुलना आप मोदी सरकार के उस वादे से कर सकते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि स्विस बैंक सेे कालाधन लाकर हर व्यक्ति के खाते में 15 लाख जमा होंगे।
सवाल- लोग मोदी की तुलना इंदिरा गांधी से करते हैं?
जवाब– मैं भी मानता हूं कि मोदी में बहुत कुछ इंदिरा गांधी जैसा है। संसाधनों पर पकड़, निर्णय पर एकाधिकार, विरोध करने वालों को हाशिए पर डालना, मजबूत नेताओं को कमजोर बनाते जाना और सबके उपर छा जाने की फितरत जैसी तमाम चीजें इंदिरा जैसी दिखती हैं। पर वह इंदिरा का आपातकाल नहीं लागू कर सकते कि वह 1975 में नहीं बल्कि 2014 में शासन कर रहे हैं।
क्या है संविधान का 44 वां संशोधन?
संविधान में 44वां संविधान संशोधन 1977 में किया गया था। संशोधन में दर्ज किया गया कि देश में आपातकाल लगाए जाने के बावजूद भी संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 को खत्म नहीं किया जाएगा। अनुच्छेद 19 में दो बेहद महत्वपूर्ण अधिकार शामिल किए गए। पहला, अभिव्यक्ति का अधिकार जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल थी, दूसरा बिना हथियार शांतिपूर्वक एकत्रित होकर विरोध करने का अधिकार। अनुच्छेद 21 के तहत प्रावधान है कि अगर किसी को गलत तरीके से गिरफ्तार किया जाता है तो वह अदालत में ‘हैबीस कॉरपस याचिका’ दाखिल कर रिहाई की अपील कर सकता है। इस संशोधन के बाद साफ हो गया था कि अब कोई भी सरकार आपातकाल लगाकर जनता के बुनियादी अधिकारों पर ताला नहीं जड़ सकती। जबकि 1975 में इंदिरा गांधी ने यह दोनों ही नागरिक अधिकार छीन लिए थे।
कौन हैं शांति भूषण?
शांति भूषण पेशे से वकील हैं। उन्हीं की पैरवी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 जून, 1975 को 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी निर्वाचन को अमान्य करार दिया था। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी की घोषणा कर दी थी। शांति भूषण इमरजेंसी के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार में कानून मंत्री थे। अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन में भी शांति भूषण ने हिस्सा लिया था।
आडवाणी ने क्या कहा था?
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने आपातकाल के 40 वर्ष पूरे होने पर कहा कि देश में फिर से आपातकाल लग सकता है। आपातकाल यानी जनाधिकारों का खात्मा। आंदोलन, अभिव्यक्ति, प्रेस की आजादी यहां तक कि अदालत के अधिकारों का छिन जाना होता है। उन्होंने आशंका की वजह अपनी ही पार्टी की मोदी सरकार के तानाशाही तौर-तरीकों को बताया है। इस पर शांतिभूषण का क्या कहना है।