शाह ने 120 हारी हुई सीटों पर ध्यान लगाया, मोदी से 17 ज्यादा 161 सभाएं कीं, दिलाई ऐतिहासिक जीत

भाजपा की ऐतिहासिक जीत के पीछे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष 56 वर्षीय अमित शाह की रणनीति रही महत्वपूर्णउन्होंने बंगाल, ओडिशा और पूर्वोत्तर जैसे राज्यों, जहां भाजपा की सीटें कम थी, वहां 2014 से ही काम शुरू कर दिया था

नई दिल्ली. भाजपा की इस अभूतपूर्व जीत के पीछे अमित शाह का माइक्रो नहीं नैनो मैनेजमेंट है, जिसे उसने कश्मीर से कन्याकुमारी तक कॉरपोरेट प्रबंधन के जरिए अंजाम दिया। शाह ने बूथों पर करीब 90 लाख सक्रिय कार्यकर्ताओं को लगाया। सामाजिक समीकरण के लिहाज से हर बूथ पर 20-20 सदस्य (1.8 करोड़) जोड़े, यानी 2 करोड़ 70 लाख कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी की।

खास बात यह है कि मोदी से ज्यादा सभाएं शाह ने की। मोदी ने 144 सभाएं की तो शाह ने 161 सभाओं को संबोधित किया। शाह को आशंका थी कि उम्मीदवारों के खिलाफ नाराजगी 2004 की तरह पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है, इसे धराशायी करने के लिए शाह ने सधी हुई रणनीति बनाई। पूरे चुनाव प्रचार अभियान को इस तरह से डिजाइन किया कि 28 मार्च से जब पीएम का प्रचार शुरू हो तो 7-8 अप्रैल तक उसे लहर में बदल दिया जाए।

इसलिए अभियान को इसी तरह से आगे बढ़ाया गया। हालांकि पहले और दूसरे चरण में खास तौर से यूपी में नुकसान की आशंका जताई जा रही थी, क्योंकि वोटिंग प्रतिशत थोड़ा कम या 2014 की तरह ही हो रहा था, जिसके बाद संघ परिवार भी आगे आया। संघ ने परोक्ष रुप से “सौ फीसदी मतदान, मेरा बहुमूल्य वोट किन्हें? उन्हें, जिन्होंने” अभियान चलाया और मेरा वोट देश के नाम से मोदी सरकार की योजनाओं का जिक्र किया।

संघ का ऐसा रहा काम

{संघ ने पहले-दूसरे चरण के बाद सक्रियता बढ़ाई। खास तौर से उत्तर प्रदेश, बंगाल और ओडिशा में हर क्षेत्र में एक-एक प्रचारक को तैनात किया 
{संघ ने सीधे भाजपा का प्रचार करने  के बजाए राष्ट्रवाद का सहारा लिया और मोदी सरकार के मुद्दों को परोक्ष तौर से उठाया।
 

बूथ पर नैनो मैनेजमेंट
 {शाह ने बूथ पर फाेकस किया था और एक साल पहले से ही इस पर सक्रियता बढ़ा दी थी। इसके लिए पार्टी ने 22 सूत्रीय एजेंडा बनाया था, जिसमें सामाजिक समीकरण के साथ-साथ मंदिर-मठ, एनजीओ, स्वसहायता समूह, लाभार्थी, सहकारी संस्थाओं से जुड़े लोगों को खास तौर से जोड़ने का काम किया।
{हर लोकसभा में 14 से 21 सदस्यों की संचालन समिति बनाई और शाह ने सभी प्रदेशों में जाकर खुद इसकी बैठक ली।
{शाह ने सामाजिक समीकरण का खास ध्यान रखते हुए हर बूथ पर 20 ऐसे वर्कर जो एससी, एसटी, ओबीसी के सदस्य जोड़े।
{हर गांव के जीते और हारे हुए सरपंचों को संपर्क करके सदस्य बनाने का काम किया।

120 हारी सीटों पर ध्यान 

{शाह ने हारी हुई 120 लोकसभा सीटों को 25 कलस्टर में बांटकर बड़े नेताओं को जिम्मेदारी देकर काम किया, जिसमें से 80 सीटों पर भाजपा ने उम्मीदवार उतारे हैं।
{भाजपा ने 10.30 बजे से पहले मतदान का विशेष अभियान चलाया। लोकसभा के हिसाब से 442 प्रमुख और 10 सह प्रमुख बनाए।
{देश की 4120 विधानसभाओं में से 2566 विधानसभा पर पार्टी ने पूर्णकालिक विस्तारक तैनात किए।
{ हर चरण में वोटिंग से पहले सभी बूथ वर्करों को अमित शाह का ऑडियो संदेश जारी किया जाता रहा।
{मोदी ने 144 सभाएं की तो शाह ने 161 सभाओं को संबोधित किया।

पश्चिम बंगाल की रणनीति
 

{2014 के चुनाव में करीब 33 सीटें ऐसी थी जहां जीतने वाले उम्मीदवार का मार्जिन तीसरे नंबर के उम्मीदवार से कम थी। भाजपा कोलकाता उत्तर और दक्षिण में नंबर दो पर रही थी और दो सीटें जीती थी।

{बंगाल में भाजपा ने डिजिटल वाल पेंटिंग का सहारा लिया और पूरे इलाके में मोदी के चेहरे के साथ पोस्टर पाट दिए। जिससे टीएमसी के कार्यकर्ता भड़के भी थी और हिंसा हुई।
{टीएमसी के कई बड़े नेताओं पर डोरा डाल पार्टी ने अपनी तरफ किया और भाजपा खेमे में इस बार सर्वाधिक बंगाल और ओडिशा से दलबदलू आए जिन्हें भाजपा ने दोनों राज्यों में टिकट दिया।

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