साउथ चाइना सी पर चीन की वॉर्निंग- दखल दिया तो होगा नुकसान

नई दिल्ली. नरेंद्र मोदी गुरुवार को जापान के दौरे पर रवाना हो गए। वह तीन दिनों के दौरे पर जा रहे हैं। एनुअल समिट के दौरान वह जापान के पीएम शिंजो अाबे से मुलाकात करेंगे। संभव है कि न्यूक्लियर डील, इन्वेस्टमेंट के अलावा दोनों के बीच साउथ चाइना सी पर भी बात हो। इस विवादित आइलैंड पर हक जताने वाले चीन भारत को चेतावनी दी है। चीनी मीडिया ने कहा- दखल देने से टूटेगा दिल्ली-बीजिंग का भरोसा…
– मोदी के जापान दौरे को लेकर चीन ने भारत को चेतावनी दी है।
– चीनी मीडिया में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है, “अगर भारत ने जापान के साथ मिलकर दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर दखलंदाजी किया और चीन को इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल का आदेश मानने को बाध्य करने की कोशिश की, तो उसे बड़ा नुकसान हो सकता है।”
– ”साउथ चाइना सी पर भारत दावेदार नहीं है। लेकिन जब से मोदी आए हैं, भारत ने लुक ईस्ट फॉरेन पॉलिसी अपना रखी है।”
– चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने अपने आर्टिकल में कहा है – “दक्षिण चीन सागर के विवाद में शामिल होने से भारत अमेरिका का सिर्फ एक मोहरा बनकर रह जाएगा। साथ ही, चीन के साथ कारोबारी नुकसान का उसे खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा।”
– ”इस विवाद में पड़ने से भारत का कोई फायदा नहीं होगा, बल्कि नई दिल्ली और बीजिंग के बीच भरोसा टूटेगा।”
भारत और जापान के रिश्ते पर एतराज
– ग्लोबल टाइम्स के ही दूसरे आर्टिकल में चीन ने भारत व जापान के बीच बढ़ रहे रिश्ते पर भी आपत्ति जताई है।
– जापान के साथ भारत के सिविल न्यूक्लियर डील के बारे में चीन ने कहा कि जापान ने अपने नियमों में ढील की।
– चीन ने बुलेट ट्रेन पर भी सवाल उठाए। कहा, ”भारत की अंडर डेवलप इकोनॉमी में जापान की महंगी हाई स्पीड तकनीक वाले इस रेल प्रोजेक्ट से कोई फायदा होगा भी, यह कहा नहीं जा सकता।”
– बता दें कि चीन भी भारत में अपना हाई स्पीड ट्रेन नेटवर्क शुरू करना चाहता है। इसके लिए वह दिल्ली-चेन्नई के बीच रेलवे कॉरिडोर की फिजिबिलिटी देख रहा है।
एनएसजी मामले पर फिर धमकाया
– चीन ने एनएसजी मेंबरशिप को लेकर भी भारत को धमकाया है।
– कहा गया है कि भारत जानता है कि नियमों के मुताबिक अब तक वह एनएसजी मेंबरशिप के लिए फिट नहीं है।
– एनएसजी यानी न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप मई 1974 में भारत के न्यूक्लियर टेस्ट के बाद बना था।
– इसमें 48 देश हैं। इनका मकसद न्यूक्लियर वेपन्स और उनके प्रोडक्शन में इस्तेमाल हो सकने वाली टेक्नीक, इक्विपमेंट और मटेरियल के एक्सपोर्ट को रोकना या कम करना है।
– 1994 में जारी एनएसजी गाइडलाइन्स के मुताबिक, कोई भी सिर्फ तभी ऐसे इक्विपमेंट के ट्रांसफर की परमिशन दे सकता है, जब उसे भरोसा हो कि इससे एटमी वेपन्स को बढ़ावा नहीं मिलेगा।
– एनएसजी के फैसलों के लिए सभी मेंबर्स का समर्थन जरूरी है। भारत के मामले में चीन और कुछ देश अड़ंगा लगाते रहे हैं।