सावधान! हिमालय में हैं तबाही की 200 झीलें

tatpar 12 july 2013

नई दिल्ली। करीब एक महीने पहले केदारनाथ में मची तबाही ने साबित कर दिया है कि उत्तराखंड से लेकर पूरे हिमालय में पिघलते ग्लेशियरों से बन रही झीलें कितनी खतरनाक साबित हो सकती है। जानकारों के मुताबिक समूचे हिमालय में ऐसी करीब 200 झीलें हैं जिनके कमजोर किनारे कभी भी टूट सकते हैं।

16 जून की रात केदारनाथ पर आसमान टूट पड़ा। मौत बन कर आया मलबे-पानी का सैलाब और तमाम रुकावटों को बहा ले गया और पीछे छूट गया दिल-दहला देनेवाला मंजर। केदारनाथ मंदिर के अगल-बगल का बाजार खत्म हो गया। हालांकि मंदिर बच गया, लेकिन अब वो 13 फुट मलबे के बीच खड़ा है। उत्तराखंड अभी भी तबाही से संभल नहीं पाया है। जगह-जगह केदारनाथ जैसी ही तबाही हुई है। ऐसे में सवाल उठता है ऐसा क्यों हुआ? क्या इंसान ने ही दी है तबाही को दावत? क्या ये अंधाधुंध विकास की कीमत है? क्या तबाही के पीछे है ग्लोबल वार्मिंग? सवाल इसलिए अहम है क्योंकि केदारनाथ में सिर्फ बादल फटने से ही तबाही नहीं आई।

दरअसल, केदारनाथ के ऊपर गंगोत्री पर्वत श्रृंखला के पर्वत केदारनाथ और केदार चोटी हैं। केदार चोटी पर ही 16 से 17 जून की दरम्यानी रात बादल फटा। इस पर्वत का बड़ा हिस्सा टूट कर मंदिर से 6 किलोमीटर दूर चोराबरी झील में जा गिरा। झील का किनारा टूट गया। उसके पानी ने बादल फटने के हादसे को मौत के तूफान में बदल दिया। केदारनाथ तबाह हो गया।

बादल फटने और झील के टूटने से कितना नुकसान हो सकता है केदारनाथ में आई तबाही के बाद समझना मुश्किल नहीं है। वैज्ञानिक भी ग्लेशियरों के पिघलने की वजह से बन रही झीलों को हादसों का टाइम बम मान रहे हैं। हिमालय में 200 ग्लेशियरों के पास बनी झीलें खतरे की घंटी बन चुकी हैं। केदारनाथ की चोराबरी झील ही नहीं हिमाचल में पारचू झील भी ऐसी ही तबाही मचा चुकी है। 2005 में पारचू के किनारे टूटने से आई सतलुज की बाढ़ ने किन्नौर में हाहाकार मचा दिया।

खतरे की इन झीलों के कमजोर किनारे पत्थर और पहाड़ी मलबे से बनते हैं जो कभी भी टूट सकते हैं। हिमालय के इन बदलावों पर डीआरडीओ की संस्था स्नो एंड एवलांच स्टडी एस्टेबलिश्मेंट यानी सासे नजर रखती है। इसके वैज्ञानिक झीलों में तब्दील होते ग्लेशियरों को बड़ा खतरा करार दे रहे हैं। सासे के संयुक्त निदेशक डॉ.एम.आर. भूटियानी के मुताबिक ग्लेशियर लेक सबसे बड़ी चिंता का कारण हैं।

उत्तराखंड जैसी तबाही रोकने के मकसद से ही सासे ने ऐसी झीलों की पहचान की है जिनका पानी धीरे-धीरे निकलना जरूरी हो गया है। पहाड़ के ठंडे रेगिस्तान लाहौल स्पिति में समुद्र टापू ग्लेशियर पर बनी झील भी ऐसी ही है। सासे ऐसी तमाम झीलों और इनके कुदरती बांधों पर रिसर्च कर रहा है, ताकि उन्हें तोड़ कर धीरे-धीरे पानी निकाला जा सके। प्रोजेक्ट कामयाब हुआ तो केदरानाथ जैसे हादसों को रोकने में मदद मिल सकती है।

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