सियाचिन: माइनस 55 डिग्री में 6 दिन 35 फीट बर्फ के नीचे कैसे जिंदा रहा जवान?

नई दिल्ली. सियाचिन में पिछले दिनों आए एवलांच के बाद यह मान लिया गया कि हादसे में मद्रास रेजिमेंट के सभी 10 जवान शहीद हो चुके हैं। लेकिन अपने साथियों को ढूंढने के लिए 150 जवान 19600 फीट की ऊंचाई पर मौजूदा सोनम पोस्ट में माइनस 55 डिग्री टेम्परेचर में डटे रहे। दो स्निफर डॉग्स और आइस कटिंग मशीनों को लेकर वे इंच-दर-इंच जवानों को तलाशते रहे। 6 दिन बाद हनुमनथप्पा को जिंदा बचाया गया।
किन दो वजहों से जिंदा रहे लांस नायक, क्या है जवान को जिंदा बचाने की पूरी कहानी…
 – 6 दिन तक जवान के जिंदा बचे रहने की दो बड़ी वजह मानी जा रही हैं। पहली- हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, जवान जब बर्फ के नीचे दबा तो उसके अंदर एक एयर बबल बन गया।
– इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन के प्रेसिडेंट एचएस चौहान बताते हैं- बर्फीली चट्टानों के बीच कई बार लेयर्स बन जाती हैं, जिससे एयर बबल या एयर पॉकेट क्रिएट हो जाते हैं। हनुमनथप्पा के केस में भी यही हुआ होगा। उनकी मजबूत विल पावर ने भी उन्हें जिंदा बचाए रखा। जबकि ऐसे मामलों में सर्वाइवल चांस 50 पर्सेंट ही होता है।
– फोर्टिस एस्कॉर्ट हार्ट इंस्टीट्यूट के कार्डियोलॉजिस्ट समीर श्रीवास्तव के मुताबिक, आम तौर पर जमा देने वाले टेम्परेचर में ही ऑर्गन ट्रांसफर किए जाते हैं या प्रिजर्व किए जाते हैं। बर्फ ही लांस नायक को जिंदा रखने में मददगार रही होगी।
– दूसरी वजह यह मानी जा रही है कि एवलांच के तुरंत बाद हनुमनथप्पा ने खुद को आर्कटिक टेंट के अंदर ढक लिया हाेगा।
– यह फाइबर से बना झोपड़ीनुमा टेंट होता है, जो आपको बर्फ में गर्म और बचाए रखता है। जवान इसे अपने साथ रखते हैं।
125 घंटे 35 फीट बर्फ के नीचे दबे रहे लांस नायक
 – कई घंटों तक 35 फीट बर्फ हटाने के बाद हनुमनथप्पा तक रेस्क्यू टीम पहुंची।
– 33 साल के हनुमनथप्पा 125 घंटे से वहां थे। बाद में उनकी बॉडी में ऑक्सीजन नहीं पहुंच पा रही थी।
– वे बेहोशी की हालत में मिले। उनकी पल्स नहीं मिल रही थी।
– उनके शरीर का पानी सूख चुका था। डिहाइड्रेशन के अलावा ठंड से हाइपोथर्मिया हो गया था।
– जम्मू- कश्मीर से दिल्ली लाए जाने के बाद उन्हें आर्मी रेफरल हाॅस्पिटल में भर्ती कराया गया है।
– यहां उनकी हालत नाजुक है। अगले 24 से 48 घंटे क्रिटिकल हैं। वे कोमा में हैं।
– उनका हालचाल जानने के लिए मंगलवार को पीएम नरेंद्र मोदी भी पहुंचे।
कब आया था एवलांच?
 – 3 फरवरी को सियाचिन आर्मी कैम्प के पास सुबह साढ़े आठ बजे के करीब एवलांच आया था।
– अपने बेस कैम्प से पैट्रोलिंग के लिए निकले एक जेसीओ समेत 10 जवानों का ग्रुप बर्फ के नीचे दब गया था।
– दरअसल, ग्लेशियर से 800 x 400 फीट का एक हिस्सा दरक जाने से एवलांच आया था।
– यह हिस्सा ढह जाने के बाद बर्फ के बड़े बोल्डर्स बड़े इलाके में फैल गए।
– इनमें से कई बोल्डर्स को तो एक बड़े कमरे जितने थे।
– इसी के बाद शुरू हुआ दुनिया के सबसे ऊंचे बैटलफील्ड सियाचिन ग्लेशियर में 19500 फीट की ऊंचाई पर रेस्क्यू ऑपरेशन।
आर्मी ने कैसे चलाया रेस्क्यू ऑपरेशन?
 – आर्मी की 19वीं मद्रास रेजिमेंट के 150 जवानों और लद्दाख स्काउट्स और सियाचिन बैटल स्कूल के जवानों को 19600 फीट की ऊंचाई पर रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए तैनात किया गया।
– इनके साथ दो स्निफर डॉग्स ‘डॉट’ और ‘मिशा’ भी थे।
– आर्मी के सामने चैलेंज यह था कि उसे 800 x 1000 मीटर के इलाके में इंच-दर-इंच सर्च करना था।
– यहां 35 फीट तक ब्लू आइस जम चुकी थी। यह क्रॉन्क्रीट से भी ज्यादा सख्त होती है।
– सियाचिन के बेहद मुश्किल मौसम को झेलने के लिए ट्रेन्ड जवानों ने चौबीसों घंटे सर्च जारी रखी।
– दिन में टेम्परेचर माइनस 30 डिग्री और रात में माइनस 55 डिग्री चला जाता था।
– इसके बावजूद जवान और दोनों खोजी डॉग डॉट और मिशा ऑपरेशन में लगे रहे।
300 उड़ानों में भेजे इक्विपमेंट्स, ऑपरेशन में कैसे मिली तकनीकी मदद?
 – आर्मी ने इतनी ऊंचाई पर पेनिट्रेशन रडार भेजे जो बर्फ के नीचे 20 मीटर की गहराई तक मेटैलिक ऑब्जेक्ट्स और हीट सिग्नेचर्स पहचान सकते हैं।
– एयरफोर्स और आर्मी एविएशन हेलिकॉप्टर के इस्तेमाल में लाए जाने वाले रेडियो सिग्नल डिटेक्टर्स भी भेजे गए। इनसे ऑपरेशन में मदद मिली।
– तेज हवाओं के चलते बार-बार रेस्क्यू ऑपरेशन में अड़चनें आईं। छठे दिन हनुमनथप्पा मिल गए। बाकी 9 जवानों के शव भी मिले।
– दरअसल, एवलांच से पहले बेस कैम्प को रेडियो मैसेज मिला था। आर्मी का मानना है कि यह मैसेज हनुमनथप्पा ने ही किया होगा।
– इस मैसेज की लोकेशन ट्रेस करते हुए टीम एक जगह पर पहुंची।
– स्निफर डॉग्स उस लोकेशन पर आकर रुक गए, जहां हनुमनथप्पा फंसे हुए थे।
– हीट सिग्नेचर्स ट्रेस करने वाले पेनिट्रेशन रडार ने भी यही लोकेशन ट्रेस की।
– इसके बाद एक लोकेशन फाइनल कर सोमवार शाम 7.30 बजे बर्फ को ड्रिल करने का काम शुरू हुआ।
धरती पर सबसे ऊंचाई पर मौजूद हेलिपैड से भेजे गए हनुमनथप्पा
 – लांस नायक को मंगलवार सुबह 9 बजे धरती में सबसे ऊंचाई पर मौजूद सेल्टोरो रिज हेलिपैड से रवाना किया गया। उन्हें सियाचिन बेस कैम्प लाया गया।
– अच्छी बात यह थी हनुमनथप्पा के शरीर पर जख्म के निशान नहीं थे। ऐसा होता तो खून बहने या जम जाने से उन्हें ज्यादा नुकसान हो सकता था।
– लेफ्टिनेंट जनरल एसके पटयाल ने बताया कि हनुमनथप्पा का बचना किसी चमत्कार से कम नहीं है। हम एक बार में 30 मिनट से ज्यादा ऑपरेशन नहीं चला पा रहे थे। फिर भी टीम डटी रही।
आर्मी के लिए क्यों बेहद अहम है सियाचिन?
 – हिमालयन रेंज में मौजूद सियाचिन ग्लेशियर वर्ल्ड का सबसे ऊंचा बैटल फील्ड है।
– 1984 से लेकर अबतक करीब 900 जवान शहीद हो चुके हैं। इनमें से ज्यादातर की शहादत एवलांच और खराब मौसम के कारण ही हुई है।
– सियाचिन से चीन और पाकिस्तान दोनों पर नजर रखी जाती है। विंटर सीजन में यहां काफी एवलांच आते रहते हैं।
– सर्दियों के सीजन में यहां एवरेज 1000 सेंटीमीटर बर्फ गिरती है। मिनिमम टेम्परेचर माइनस 50 डिग्री (माइनस 140 डिग्री फॉरेनहाइट) तक हो जाता है।
– जवानों के शहीद होने की वजह ज्यादातर एवलांच, लैंड स्लाइड, ज्यादा ठंड के चलते टिश्यू ब्रेक, एल्टिट्यूड सिकनेस और पैट्रोलिंग के दौरान ज्यादा ठंड से हार्ट फेल हो जाने की वजह होती है।
– सियाचिन में फॉरवर्ड पोस्ट पर एक जवान की तैनाती 30 दिन से ज्यादा नहीं होती।
– ऑक्सीजन का स्तर पर भी यहां कम रहता है। यहां टूथपेस्ट भी जम जाता है। सही ढंग से बोलने में भी काफी मुश्किलें आती हैं।
– सैनिकों को यहां हाइपोक्सिया और हाई एल्टिट्यूड पर होने वाली बीमारियां हो जाती हैं।
– वजन घटने लगता है। भूख नहीं लगती, नींद नहीं आने की बीमारी। मेमोरी लॉस का भी खतरा।
एक रोटी 200 रुपए की
 – हर रोज आर्मी की तैनाती पर 7 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। यानी हर सेकंड 18 हजार रुपए।
– इतनी रकम में एक साल में 4000 सेकंडरी स्कूल बनाए जा सकते हैं।
– यदि एक रोटी 2 रुपए की है तो यह सियाचिन तक पहुंचते-पहुंचते 200 रुपए की हो जाती है।
जवान का जिंदा निकलना चमत्कार क्यों?
– एवलांच में फंसे 92 पर्सेंट लोग तभी जिंदा बच पाते हैं, जब उन्हें 15 मिनट के अंदर बाहर निकाल लिया जाए।
– 35 मिनट के बाद तो 27 पर्सेंट ही जिंदा रह पाते हैं।
– बर्फ में दबने के 10 मिनट बाद ब्रेन डैमेज होना शुरू हो जाता है।
– लांस नायक हनुमनथप्पा तो 125 घंटे बर्फ में दबे रहे।
दुनिया में ऐसे कितने अजूबे हुए?
– 15 दिन : जनवरी 2010 में हैती में भूकंप आया। 15 दिन बाद मलबे से एक लड़की जिंदा निकली।
– 17 दिन : मई 2013 में ढाका में एक इमारत ढह गई। 17 दिन बाद महिला को जिंदा निकाला गया।
– 24 दिन : 2006 में जापान में मित्सुताका उचिकोशी 24 दिन बर्फीले इलाके में फंसे रहे। उन्हें हाइपोथर्मिया हुआ, लेकिन वे जिंदा रहे।
– 36 दिन : दिसंबर 2015 में चीन की एक खदान जमींदोज हो गई। इसमें दबे चार मजदूरों को 36 दिन बाद 29 जनवरी, 2016 को बाहर निकाला गया।
– 22 घंटे : नेपाल में अप्रैल 2015 के भूकंप के बाद चार महीने का बच्चा 22 घंटे तक मलबे में जिंदा रहा। नेपाल और ताइवान में हालिया भूकंपों में 60 घंटे बाद तक भी लोगों को जिंदा निकाले जाने की खबरें आईं।