सुरखी है सुर्खियों में,सांची में है शांति

 

 

 

 

 

 

  • 2 साल बाद चुनाव की नौबत क्यों बनी,ये भी चुनावी मुद्दा
  • चौपालों-बाजारों में चुनावी चर्चे,जीत-हार के लग रहे दावे

शैलेन्द्र सिंह पंवार, इंदौर। सागर जिले की सुरखी विधानसभा में चुनावी माहौल दिखता है, पर रायसेन जिले की सांची विधानसभा में अभी माहौल शांत सा है। दोनों ही क्षेत्रों में कौन जीतेगा और कौन हारेगा, इसकी चर्चाएं गांव-चौपालों व बाजारों में आसानी से सुनी व देखी जा सकती है। हर आयु वर्ग के मतदाता अपने हिसाब से जीत और हार के समीकरण बताते है। इनके दावों में कितना दम है यह तो 10 नवम्बर को पता चलेगा, लेकिन महज दो साल बाद ही चुनाव की स्थिति क्यों बनी और इसके लिए कौन जिम्मेदार है, इसकी चर्चाएं ग्रामीणों के बीच आज भी है, तय है कि ये चर्चाएं मतदान दिवस तक जारी रहेंगी। कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर पारूल साहू के मैदान में होने से सुरखी “सुर्खियों” में है, जबकि सांची में इसलिए शांती है, क्योंकि मदनलाल चौधरी को कांग्रेस से गंभीर प्रत्याशी नहीं माना जा रहा है। सुरखी-सांची से लौटकर एक रिपोर्ट

सुरखी में पारूल ने मुकाबले को बनाया रोचक

सुरखी में भाजपा प्रत्याशी गोविंद सिंह राजपूत के सामने कांग्रेस ने पारूल साहू को उतारकर मुकाबला रोचक बना दिया है। पारूल यहां से भाजपा विधायक रह चुकी है और कुछ दिनों पुर्व ही उनका कांग्रेस में प्रवेश हुआ है। उनके पिता संतोष साहू क्षेत्र के बड़े शराब कारोबारी है, वे भी बंडा विधानसभा से विधायक रह चुके है, इस लिहाज से पारूल साधन, संपन्न व दबंगई में किसी भी तरह कमजोर नहीं है। कुछ दिनों पुर्व तक गोविंद राजपूत के लिए विजय आसान थी, लेकिन पारूल के अचानक मैदान में आ जाने से सुरखी हाईप्रोफाईल सीट हो गई है। हालांकि राजपूत अधिक मजबूत है, क्योंकि पारूल की तुलना में वे ज्यादा सक्रिय है, साधन-संपन्न होने के साथ ही राजपूत का मतदाताओं से सीधा संपर्क है, फिर यहां के अधिकांश मतदाताओं की मानसिकता भी भाजपाई है, बिते 6 माह में मंत्री रहते हुए राजपूत ने क्षेत्र को करोड़ों के विकास कार्यों की सौगात दी है। भाजपा का मजबूत संगठन होने से असंतुष्ट कार्यकर्ता भी उनके लिए जुटे हुए है, राजपूत की निजि टीम है और कई कांग्रेसियों ने भी भाजपा की सदस्यता ली है। पारूल के बारे में यह चर्चा आम है, कि विधायक कार्यकाल के दौरान उनकी क्षेत्र से दूरी रही, शायद इसलिए भी भाजपा ने 2018 में उनको टिकट नहीं दिया था। पारूल ने 2013 में राजपूत को 173 मतों से पराजित किया था, साधन संपन्न होने के साथ ही एक यही कारण से पारूल मजबूत है।

■ कांग्रेसियों पर पुलिस कार्रवाई
जैसीनगर कस्बे के किराना व्यापारी रामकुमार की दुकान पर भाजपा-कांग्रेस दोनों ही के स्टीकर चिपके है, पुछने पर बोलते है कि जिसे जो लगाना है लगा दें, पर हम कुछ नहीं बोलेंगे। अभी माहौल ठीक नहीं है, कांग्रेस का पक्ष लेने वालों के यहां पिछले दिनों में पुलिसियां कार्रवाई हुई है, ऐसी ही बात आस-पास के अन्य गांव के लोगों ने भी कही है, ये भाजपा के लिए घातक भी हो सकता है।

■ जातिगत समीकरण
सुरखी में राजपूत, दांगी, यादव, ब्राहम्ण सहित अन्य पिछड़ा व अजा वर्ग के मतदाताओं का प्रभाव है। 2 लाख से अधिक मतदाता है और 125 के लगभग पंचायतें है। पारूल की तुलना में राजपूत ने अपने तीन कार्यकाल में क्षेत्र में खूब काम करवाए है।

मिजाज भाजपाई होने से सांची में प्रभुराम मजबूत

सांची विधानसभा में चुनावी चर्चे कम है और माहौल भी अभी पुरी तरह से जमा नहीं है, इसका एक कारण गौरीशंकर शैजवार भी है, 40 साल के इतिहास में वो या उनके परिवार से कोई चुनावी मैदान में नहीं है। 38 साल तक डां. शैजवार ही भाजपा की पहचान थे और 2018 में उनके पुत्र मुदित को प्रत्याशी बनाया गया था। अब डां. शैजवार के प्रतिव्दंदी डां. प्रभुराम चौधरी भाजपा प्रत्याशी है, जो पिछले 35 साल से कांग्रेस की पहचान थे। अब कांग्रेस से मदनलाल चौधरी उम्मीदवार है, जिनको क्षेत्र में पहचान का संकट है, शायद इस कारण से टिकट बदलने की चर्चाएं भी थी। मदनलाल को कमजोर माना जा रहा है, फिर उनको कई कांग्रेस नेता व कार्यकर्ताओं का भी समर्थन नहीं मिल रहा है। दिक्कतें प्रभुराम के साथ भी है, शैजवार के कई समर्थक उन्हें स्वीकार नहीं कर रहे है, पर चाक चौबंद संगठन के कारण जुटे है। डां. शैजवार एक तरह से दूर है,पर मुदित दिखाई दे रहे है। प्रभुराम के खाते में क्षेत्र के लिए कोई विशेष उपलब्धि नहीं है, पर क्षेत्र का मिजाज भाजपाई होने से वे मजबूत है। कई लोग प्रभुराम के भाजपा उम्मीदवार होने पर चौंक जाते है, लेकिन विश्वास से कहते है कि जीतेगी भाजपा ही। अजा सीट सांची से प्रभुराम 1985, 2008 व 2108 में विधायक रह चुके है, जबकि मदनलाल का यह पहला चुनाव है।

■ बच्चा भी जीतेगा भाजपा से
गैरतगंज में पेट्रोल पंप कर्मी राजेश शाक्य कहते है कि 2018 में मुदित की बजाए डां. साहब चुनाव लड़ते तो आसानी से जीत जाते, अब प्रभुराम भाजपा उम्मीदवार है तो भी कोई दिक्कत नहीं है, भाजपा से बच्चें को चुनाव लड़ा दो तो वो भी जीत जाएगा, चुनावी शांती मदनलाल के कारण दिखाई दे रही है। हालांकि ऐसा आत्मविश्वास भाजपा के लिए घातक हो सकता है।

■ जातिगत समीकरण
क्षेत्र में अजा वर्ग के मतदाताओं का प्रभाव है, इनमे अहिरवार, कोरी, खटीक प्रमुख है। कुशवाह, यादव, लोधी, राजपूत, ब्राहम्ण व अल्पसंख्यक मतदाता भी है। रायसेन नगर पालिका, सांची व गैरतगंज नगर परिषद सहित 100 से अधिक ग्राम पंचायतें है, कुल मतदाता 2 लाख से अधिक है।।

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