सुशांत केस

 

 

 

 

 

 

 

प्रवीण मैशेरी, रायपुर। सुशांत मामलें में पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का समय नहीं नहीं लिखना यह बताता है मौत कुछ घण्टों या एक दिन पहले तो नहीं हो गई थी ? जिसे बाद में आत्महत्या का स्वरूप दिया गया, जिन डॉक्टरों पुलिसकर्मियों ने सुशांत मामले की शुरुआती जांच की उन्हें भी जबरजस्ती कोरोना पोजेटिव बताकर कवरन्टीन में भेजा जाना ताकि CBI उनसें पूछताछ न कर सके मुंबई पुलिस एवं उध्दव सरकार को संदेह के साथ कटघरे में खड़ा करती है कि यह वास्तव में आत्महत्या है या हत्या? कौन किसे बचा रहां हैं? अब तो दिल्ली एम्स की फोरेंसिक डिम ने भी कूपर हॉस्पिटल की पोस्मार्टम रिपोर्ट को फर्जी बताया है उन्हों ने CBI को स्पष्ट कहा है  वह  हत्या का मामला मानकर जांच करें सुशांत का शव ले जाने दो एम्बुलेंस क्यों बुलाई गई? क्या रास्तें में शव की अदला बदली की गई? शमशान में सुशांत की बहन को सुशांत का चहेरा देखने से क्यों रोका गया? जैसे अनेक संदिग्ध प्रश्न महाराष्ट्र सरकार उध्दव ठाकरे की तरफ कुछ तो इशारा कर रहें हैं दाल में काला है या पूरी की पूरी दाल ही काली है इन बातों के खुलासे की अपेक्षा CBI से है असली अपराधियों को बचाने अधिकतर सबूतों को नष्ट कर दिया गया है पर कहावत है पाप छत पर चढ़कर बोलता है।