13 साल में तीसरी बार भी नहीं मिली गुजरात के एंटी टेरर बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी

नई दिल्ली. राष्ट्रपति ने गुजरात कंट्रोल ऑफ टेररिज्म एंड ऑर्गनाइज्ड क्राइम (जीसीटीओसी) बिल 2015 को होम मिनिस्ट्री को वापस कर दिया है। प्रणब मुखर्जी ने बिल में कुछ बदलाव करने को कहा है। बता दें कि पहले भी दो प्रेसिडेंट बदलाव की बात कहकर बिल लौटा चुके हैं।
बिल के कुछ प्रोविजन से हो सकता है टकराव…
– 31 मार्च 2015 को गुजरात असेंबली ने जीसीटीओसी बिल पास किया था।
– असेंबली में पहली बार 2003 में नरेंद्र मोदी के सीएम रहते हुए लाया गया था।
– सितंबर 2015 में जीसीटीओसी को होम मिनिस्ट्री ने पास कर दिया था। इसके बाद उसे प्रेसिडेंट के साइन होने के लिए भेजा गया था।
– ऑफिशियल्स के मुताबिक बिल की कुछ बातों से केंद्रीय कानून से टकराव हो सकता है।
क्या कहा होम मिनिस्ट्री ने?
– एक अफसर के मुताबिक, होम मिनिस्ट्री गुजरात सरकार से बिल के जरूरी इनपुट लेकर राष्ट्रपति को देगी। बिल में जरूरी सुधार करके फिर से राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा।
केंद्र ने भी लौटाया था बिल
– जुलाई 2015 में जीसीटीओसी बिल को केंद्र ने भी राज्य सरकार को लौटा दिया था।
– इन्फॉर्मेशन एंड टेक्नोलॉजी मिनिस्ट्री ने बिल में कुछ ऑब्जेक्शन लगाए थे।
– आईटी मिनिस्ट्री ने कहा था कि बिल में टेलिफोन पर की गई बातचीत को रिकॉर्ड करने का अधिकार दिया गया था। साथ ही इसे कोर्ट में एविडेंस की तरह पेश करने की भी बात कही गई थी।
– गुजरात सरकार ने आईटी मिनिस्ट्री के ऑब्जेक्शन को रिजेक्ट कर दिया था।
– गुजरात सरकार ने जवाब दिया कि कॉस्टिट्यूशन की समवर्ती सूची (कॉन्करेंट लिस्ट) के मुताबिक केंद्र और राज्य सरकार दोनों क्रिमिनल कानून और प्रोसीजर तैयार कर सकते हैं।
क्या हुआ बिल में चेंज?
– GCTOC बिल, 2015 में एक बदलाव किया गया था।
– बिल का नाम GUJCOC कर दिया गया। इसमें टेररिज्म शब्द जोड़ दिया गया।
– इसके मुताबिक किसी आरोपी की फोन पर या इन्वेस्टीगेशन अफसर से की गई बातचीत को रिकॉर्ड कर कोर्ट में बतौर एविडेंस पेश किया जा सकेगा।
पहले किन प्रेसिडेंट्स ने लौटाया?
– 2004 में भी तब प्रेसिडेंट रहे डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने भी बिल को वापस भेजा था।
– साथ ही फोन पर बातचीत को रिकॉर्ड करने वाला क्लॉज हटाने की बात कही थी।
– इसके बाद गुजरात असेंबली ने दो बार बिल पास कर दिया।
– इसके बात प्रतिभा पाटिल ने भी बिल को वापस लौटा दिया।
– पाटिल ने इन्वेस्टीगेशन अफसर के सामने कही बात को कोर्ट में बतौर सबूत पेश करने वाले प्रोविजन समेत कुछ और बदलाव करने को कहा।
– गुजरात असेंबली ने पाटिल के सुझावों को खारिज करते हुए 2009 में तीसरी बिल पास कर दिया।
– बिल में सिर्फ यह बदलाव किया गया कि एसपी या उससे ऊपर की रैंक के अफसर के सामने दिए गए बयान को ही कोर्ट में बतौर सबूत पेश किया जाएगा।
बिल: एक नजर में
– 2003- गुजरात की मोदी सरकार महाराष्ट्र के मकोका की तर्ज पर GUJCOC बिल लाई। बिल को असेंबली ने पास कर दिया और केंद्र को भेजा गया।
– 2004- प्रेसिडेंट एपीजे अब्दुल कलाम ने बदलाव की बात कहते हुए बिल को लौटा दिया।
– 2008- गुजरात असेंबली ने बातचीत रिकॉर्ड वाले क्लॉज को हटाकर दोबारा बिल भेज दिया।
– 2009- प्रेसिडेंट प्रतिभा पाटिल ने बिल को वापस भेज दिया। पाटिल ने पुलिस अफसर के सामने दिए गए बयान को सबूत के तौर पर पेश करने की बात में बदलाव करने को कहा।
– 2015- गुजरात सरकार ने बिल में छोटा सा बदलाव किया। बिल में टेररिज्म नाम जोड़कर केंद्र के अप्रूवल के लिए भेजा। आईटी मिनिस्ट्री ने ऑब्जेक्शन लगाया और बिल को वापस भेजा।