16 साल बाद भारत की सबमरीन टेस्ट के लिए रवाना, इन देशों पर रख सकेंगे नजर

नई दिल्ली. नौसेना की स्कार्पीन कैटेगरी की छह सबमरीन में से पहली, आईएनएस कल्वरी मुंबई के समंदर में टेस्टिंग के लिए रवाना हो गई। चीन, पाकिस्तान के समंदर के रास्ते पर नजर रखने के लिए कल्वरी अहम साबित हो सकती है। फिलहाल कल्वरी पर हैवीवेट टॉरपीडो को नहीं ले जाया सकता। सितंबर के अंत तक इसके नेवी में शामिल होने की पॉसिबिलिटी है।
डीजल-इलेक्ट्रिक पावर से चलती है कल्वरी…
– डीजल-इलेक्ट्रिक पावर से चलने वाली कल्वरी लंबाई 66 मीटर है।
– कल्वरी रविवार को मुंबई तट से रवाना हुई।
2015 में मनोहर पर्रिकर की मौजूदगी में मझगांव डॉकयार्ड में इसे पानी में उतारा गया था।
– नौसेना के एक अफसर ने बताया, ‘यह हमारे लिए गर्व का पल है। इस कैटेगरी की पांच अन्य सबमरीन को हर नौ महीने पर रवाना किया जा सकता है।’
– नेवी के सूत्रों के मुताबिक, ये अक्टूबर 2005 में डिफेंस मिनिस्ट्री की ओर से फ्रांस की कंपनी डीसीएनएस के साथ किए गए 3.6 अरब डॉलर (लगभग 19.92 करोड़ रुपए) के करार का हिस्सा है।
– इस कैटेगरी की पांच और सबमरीन डीसीएनएस के सहयोग से भारत में बनाई जा रहीं हैं।
– भारत इनके बाद दो और सबमरीन को शामिल करने की कोशिश करेगा। – नेवी के पास अभी 14 सबमरीन हैं।
क्या कहते हैं नेवी चीफ?
– चीफ ऑफ नेवल स्टाफ एडमिरल आरके धोवन ने कहा, “सबमरीन्स के लिए ज्यादा वजन वाले टॉरपीडो काफी अहम हैं।’
– ‘नेवी की तमान कोशिशों के बाद भी टॉरपीडो हासिल करने की प्रक्रिया डिफेंस मिनिस्ट्री में फंसी हुई है। हम इसके लिए से फिर बात करेंगे।’
क्यो जरूरी है ये सबमरीन?
– पाकिस्तान, चीन की तरफ से खतरे को देखते हुए भारत के पास मॉडर्न सबमरीन होना जरूरी है।
– कल्वरी एंटी शिप मिसाइल SM-39 दागने में कैपेबल है।
– हालांकि कल्वरी में भारी टॉरपीडो (सबमरीन से मार करने वाली मिसाइल) को नहीं ले जाया सकता।
– सूत्रों की मानें तो अभी कल्वरी वैसी ही है जैसे गोली के बिना बंदूक।
– इटली से 1800 करोड़ कीमत के ‘ब्लैक शार्क’ टॉरपीडो लिए जाने का मसला हेलिकॉप्टर डील के चलते फंसा हुआ है।
– ब्लैक शार्क टॉरपीडो सप्लाई फिनमैक्केनिका की ही एक कंपनी ‘व्हाइटहेड एलेनिया सिस्टेमी सबएक्वल’ करने वाली है।
क्यों फंसा ब्लैक टॉरपीडो का मुद्दा?
– जर्मन कंपनी एटलस इलेक्ट्रिक ने भारत के ब्लैक शार्क चुने जाने की प्रॉसेस की शिकायत की थी।
– भारत ने जर्मन ‘सीहेक टॉरपीडो’ की जगह इतालवी ‘ब्लैक शार्क’ चुना था।
– जर्मनी की आपत्ति के बाद जांच के लिए स्पेशल टेक्नीकल कमेटी बनाई गई थी।
– अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर डील मुद्दा गर्माने के बाद ‘ब्लैक शार्क’ की प्रॉसेस एक बार फिर ढीली पड़ गई।

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