215 सीटों को कवर करने की कोशिश करेंगे मोदी, लिंगायतों का रुख अभी साफ नहीं

  • जनता दल सेकुलर को पहली बार एकसाथ चार दलों का समर्थन
  • 2013 का जेडीएस और बसपा का वोट शेयर भाजपा को मिले वोटों से ज्यादा

बेंगलुरु. इस बार कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में कई बातें पहली बार हो रही हैं। अगर ये राज्य सत्ताधारी कांग्रेस के हाथ से निकल गया तो पार्टी सिर्फ दो राज्य पंजाब और पुडुचेरी में सिमट कर रह जाएगी। भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव लाते हुए मोदी की रैलियों की संख्या 15 से बढ़ाकर 21 कर दी हैं। कर्नाटक चुनाव में किसी प्रधानमंत्री की ये अब तक की सबसे ज्यादा चुनावी रैलियां होंगी। उधर, सरकार बनाने में अहम रोल निभाने वाले लिंगायत समुदाय ने पहली बार अपने पत्ते नहीं खोले हैं। वहीं, ऐसा पहली बार हो रहा है कि भाजपा को घेरने के लिए जनता दल सेकुलर और बसपा ने गठबंधन किया है। इस चुनाव में पहली बार क्या हो रहा है?

1) पहली बार कर्नाटक में किसी प्रधानमंत्री की 21 रैलियां, 224 में से 215 सीटें कवर करेंगे
– कर्नाटक में बदलते समीकरण के बीच भाजपा को भी अपनी रणनीति बीच में बदलनी पड़ी। नरेंद्र मोदी की पहले 15 रैलियां प्रस्तावित थीं। अब 6 रैलियां बढ़कर 21 कर दी गई हैं। संभवत: राज्य के 62 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि विधानसभा चुनाव में कोई प्रधानमंत्री इतनी रैलियां कर रहा है। मोदी 6 रैलियां कर चुके हैं। मोदी इन सभाओं के जरिए 215 सीटों को कवर करेंगे।

2) पहली बार जेडीएस को बसपा समेत एकसाथ चार दलों का समर्थन
– कर्नाटक में 224 में से 36 सीटें एससी और 15 सीटें एसटी के लिए सुरक्षित हैं। हालांकि, इन 51 एससी-एसटी सीटों में से जेडीएस को 2008 में 2 और 2013 में 13 सीटें मिली थीं। 2013 में बसपा को 0.9% और जेडीएस को 20.2% वोट मिले थे। अगर इन्हें मिला दिया जाए तो ये वोट शेयर भाजपा के वोट शेयर 19.9% से ज्यादा हो जाता है।
– इन 51 सीटों समेत राज्य की करीब 60 सीटों पर दलित समुदाय और 40 सीटों पर आदिवासी समुदाय के वोटर असर डालते हैं। यही वजह है कि बसपा ने 1996 के बाद पहली बार चुनाव से पहले किसी दल के साथ गठबंधन किया है। यह गठबंधन जेडीएस से हुआ है। बसपा 22 सीट पर तो जेडीएस 201 सीट पर चुनाव लड़ रही है।
– जेडीएस को भाजपा विरोधी पार्टी एनसीपी, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) और तेलुगु देशम पार्टी (टीआरएस) टीआरएस ने समर्थन देने का एलान किया है। इससे करीब 20 सीटों पर जेडीएस को फायदा मिल सकता है।

– एआईएमआईएम पहले राज्य में 60 पर चुनाव लड़ने वाली थी, लेकिन बाद में जेडीएस को समर्थन देने की वजह से उसने कोई नॉमिनेशन नहीं भरा। प्रदेश में 13 फीसदी मुसलमान वोटर हैं। तटीय कर्नाटक के जिलों में इसका फायदा मिल सकता है। वहीं, चंद्रशेखर राव ने तेलुगु भाषियों से जेडीएस को वोट देने की अपील की है।

3) लिंगायतों का रुख साफ नहीं
– इससे पहले राज्य में जितने चुनाव हुए, उनमें लिंगायत वोटर्स का रुझान स्पष्ट रहा था कि वे किसे वोट करेंगे। लेकिन इस बार चुनाव से पहले कांग्रेस ने एलान किया कि वह लिंगायतों को अल्पसंख्यकों का दर्जा देगी। इससे मामला फंस गया।
– 1980 के दशक में राज्य में तब जनता दल के नेता रामकृष्ण हेगड़े पर लिंगायतों ने भरोसा जताया था। बाद में यह समुदाय कांग्रेस के वीरेंद्र पाटिल के साथ आया। 1989 में कांग्रेस की सरकार बनी। पाटिल मुख्यमंत्री चुने गए, लेकिन राजीव गांधी ने उन्हें इस पद से हटा दिया था।
– इसके बाद लिंगायत फिर से हेगड़े के सपोर्ट में आ गए। 2004 में हेगड़े की मौत के बाद लिंगायतों ने भाजपा के बीएस येदियुरप्पा को अपना नेता चुना। जब भाजपा ने 2011 में येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटाया तो इस समुदाय ने भाजपा से दूरी बना ली।

2013 विधानसभा चुनाव : येदियुरप्पा के भाजपा छोड़ते ही कांग्रेस ने बनाई थी सरकार

पार्टी सीट वोट शेयर
कांग्रेस 122 36.6%
जेडीएस 40 20.2%
भाजपा 40 19.9%
अन्य 22 23.3%

कर्नाटक में वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय से 14 मुख्यमंत्री बने

50% विधायक और सांसद अब तक इन्हीं दोनों कम्युनिटी से आते रहे हैं।

224 मौजूदा विधायकों में 55 वोक्कालिगा और 52 लिंगायत कम्युनिटी से हैं।

100 सीटों पर लिंगायत और 80 सीटों पर वोक्कालिगा कम्युनिटी असर डालती है।

14 मुख्यमंत्री (8 लिंगायत और 6 वोक्कालिगा) राज्य में दोनों कम्युनिटी से हुए हैं।

राज्य में दलित आबादी सबसे ज्यादा

दलित: 19%,

मुस्लिम: 16%

ओबीसी: 16%

लिंगायत: 17%

वोक्कालिगा: 11%