भोपाल। रूस और यूक्रेन में चल रहे युद्ध के बीच मंहगाई का डर लोगों को सताने लगा है। खास तौर पर ज्वलनशील प्रोडक्टों के दामों में बेतहाशा वृद्धि के अनुमान लगाए जा रहे है। इसके पीछे की मुख्यम वजह है अंतर्राष्ट्रीय बजार में पेट्रोलियम पदार्थों के थोक दामों में रिकार्ड बढ़ोत्तरी दर्ज होना। ज्ञात हो कि बीते एक दशक में अब तक के सवोच्चतम स्तर पर पहुंचे कच्चे तेल के दामों के कारण भारत ही नहीं समूची दुनियां मंहगाई के दंश को झेल रही है। लेकिन फिलहाल भारत में चल रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के कारण लोगों को अभी तक राहत मिली हुई है। यही कारण है कि बी 4-5 माह से प्रतिमाह होने वाले पेट्रोल और डीजल के दामों में कोई बदलाव नहीं देखा गया है। जबकि बीते साल इन्ही माह में कोरोना की कमी के कारण कम खफत के बाद भी पेट्रोल और डीजल सहित एलपीजी व सीएनजी के दामों में भारी वृद्धि देखी गई थी। किन्तु चुनावी माहौल को अपने पक्ष में करने के कारण केन्द्र सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बढ़ते कच्चे तेलों के दामों के बाबजूद भी पेट्रोल और डीजल के दामों में कोई वृद्धि नहीं की है। हालांकि 7 मार्च को उत्तरप्रदेश के अंतिम चरण के चुनावों के बाद ऐसे कयास लगाए जा रहे है कि अब यह राहत कुद दिनों की शेष है। विधानसभा चुनावों के परिणामों से पूर्व ही पेट्रोलियम कम्पनियां दाम बढ़ाने के लिए विचार कर सकती है। जिससे आम जनता को एक बार फिर से मंहगाई की मार का सामना करना पड़ेगा।
दैनिक उपभोग की वस्तुओं में भी लगेगी आग
जहां पेट्रोल और डीजल के दामों में संभावित वृद्धि के कारण आम उपयोग की वस्तुओं के दामों में वृद्धि के आसार जताएं जा रहे है। इससे पूर्व यूके्रन और रूस के बीच चल रहे युद्ध के कारण खाद्य तेलों के दामों में भी भारी वृद्धि हुई है। महज एक सप्ताह के अंदर ही 10 से 20 प्रतिशत दाम सोयाबीन तेल और अन्य तेलों में वृद्धि दर्ज की जा चुकी है। ऐसे में पेट्रोल और डीजल के दामों में संभावित वृद्धि से लोग अभी से परेशान है।

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