नई दिल्ली. जम्मू-कश्मीर के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों पर गुरुवार को पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत केस दर्ज कर लिया गया। दरअसल, नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) नेता उमर अब्दुल्ला और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) नेता महबूबा मुफ्ती की हिरासत अवधि गुरुवार को ही खत्म हो रही थी। ये दोनों नेता अगस्त, 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से ही नजरबंदी में सरकारी गेस्ट हाउस में रखे गए हैं।

अब्दुल्ला और मुफ्ती के अलावा दो अन्य नेताओं पर भी पीएसए के तहत केस दर्ज किया गया है। इनमें नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता और पूर्व मंत्री अली मोहम्मद सगर और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के मामा सरताज मदनी का नाम शामिल हैं। इनकी हिरासत अवधि भी गुरुवार को खत्म हो रही थी।

फारूक अपने घर में नजरबंद

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और उमर के पिता फारूक अब्दुल्ला को श्रीनगर स्थित उनके घर में नजरबंद रखा गया है। 17 सितंबर को कश्मीर प्रशासन ने उन पर पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था। 14 दिसंबर को उनकी नजरबंदी 3 महीने के लिए बढ़ा दी गई थी। खास बात यह है कि इस कानून को फारूक के पिता शेख अब्दुल्ला ने 1978 में लागू किया था।

बुधवार को दो नेता रिहा हुए

इससे पहले, बुधवार को पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के सज्जाद लोन और पीडीपी के वहीद पर्रा को रिहा कर दिया गया था।बीते छह महीनों ने नजरबंद नेताओं को रिहा करने की यह सातवीं घोषणा है। इससे पहले 26 नवंबर, 30 दिसंबर, 10 जनवरी, 16 जनवरी और 18 जनवरी को नेताओं को रिहा किया गया था।

सरकार ने कहा- 55 नेता रिहा किए गए

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्‌डी ने बुधवार को राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में कहा कि जम्मू-कश्मीर में पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत 389 लोग हिरासत में हैं। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद 444 लोगों को इस कानून के तहत हिरासत में लेने का आदेश जारी हुआ था। इनमें से 55 नेता रिहा किए जा चुके हैं।

क्या है पीएसए?
पीएसए के तहत सरकार किसी भी व्यक्ति को भड़काऊ या राज्य के लिए नुकसानदेह मानकर हिरासत में ले सकती है। यह कानून आदेश देने वाले अफसर के अधिकार क्षेत्र की सीमा के बाहर व्यक्तियों को हिरासत में लेने की अनुमति देता है। कानून के सेक्शन 13 के मुताबिक, हिरासत में लेने का आदेश केवल कमिश्नर या डीएम जारी कर सकता है। इसमें कोई भी यह कहने के लिए बाध्य नहीं है कि कानून जनहित के खिलाफ है। 

कानून के दो सेक्शंस हैं। एक- लोगों के लिए खतरा देखते हुए, इसमें बिना ट्रायल के व्यक्ति को 3 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है। इसे 6 महीने तक बढ़ाया जा सकता है। दूसरा- राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा, इसमें दो साल तक हिरासत में रखा जा सकता है।

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